tag:blogger.com,1999:blog-164875512008-05-07T17:55:08.887-04:00कुछ सच्चे मोतीRohit Wasonhttp://www.blogger.com/profile/07669803884215474699noreply@blogger.comBlogger80125tag:blogger.com,1999:blog-16487551.post-50532964191177080172008-03-17T23:03:00.002-04:002008-03-17T23:06:01.045-04:00तारे ज़मीं परये प्यारा-सा मोती किसने नहीं सुना होगा?
देखो इन्हें, ये हैं आस की बूँदें
पत्तों की गोद में, आस्माँ से कूदें
अँगडाई लें, फिर करवट बदल कर
नाज़ुक-से मोती, हँस दें फिसलकर
खो न जायें ये...तारे ज़मीं पर
ये तो हैं सर्दी में, धूप की किरणे
उतरें तो आँगन को सुनहरा-सा कर दें
मन के अँधेरों को रौशन-सा कर दें
ठिठुरती हथेली की रँगत बदल दें
खो न जायें ये...तारे ज़मीं पर
जैसे आँखों की डिबिया में निँदिया
और Rohit Wasonhttp://www.blogger.com/profile/07669803884215474699noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-16487551.post-89181530048529521002007-07-28T21:31:00.000-04:002007-07-28T21:39:31.535-04:00दीवाना बनाना है तो दीवाना बना देबेग़म अख्तर का गाया हुआ एक और सच्चा मोती:
दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे
वरना कहीं तक़दीर तमाशा न बना दे
ऐ देखनेवालों मुझे हँस-हँसके न देखो
तुमको भी मुहब्बत कहीँ मुझ-सा न बना दे
मैं ढूँढ रहा हूँ मेरी वो शम्मा कहाँ है
जो बज़्म की हर चीज़ को परवाना बना दे
आखिर कोई सूरत भी तो हो खाना-ए-दिल की
क़ाबा नहीं बनता है तो बुतखाना बना दे
'बेहज़ाद हरेक जाम पे इक सजदा-ए-मस्ती
हर ज़र्रे को सँग-ए-दर-ए-जानाँ न Rohit Wasonhttp://www.blogger.com/profile/07669803884215474699noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-16487551.post-42137408935664508102007-07-05T19:32:00.000-04:002007-07-06T22:47:47.551-04:00दोस्त बनकर भी नहीं साथ निभाने वालाग़ुलाम अली के शास्त्रीय-संगीत का नमूना इस खूबसूरत ग़ज़ल में दिखता है:
दोस्त बनकर भी नहीं साथ निभाने वाला
वही अन्दाज़ है ज़ालिम का ज़माने वाला
अब इसे लोग समझते हैं गिरफ़्तार मेरा
सख्त नदीम है मुझे दाम में लाने वाला
क्या कहें कितने मरासिम थे हमारे इससे
वो जो इक शक़्स है मुँह फेर के जाने वाला
तेरे होते हुए आ जाती थी सारी दुनिया
आज तन्हा हूँ तो कोई नहीं आने वाला
मुन्तज़िर किसका हूँ टूटी हुई दहलीज़ पे मैं
Rohit Wasonhttp://www.blogger.com/profile/07669803884215474699noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-16487551.post-31704501449882955572007-06-10T09:18:00.000-04:002007-06-10T09:24:54.417-04:00सरफ़रोशी की तमन्नाबिसमिल अज़ीमाबादी की ये पन्क्तियाँ राम प्रसाद 'बिसमिल' ने क्रान्तिकारी आँदोलन में देशभर में मशहूर कर दीं थीं:
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कातिल में है
करता नहीं क्यूँ दूसरा कुछ बातचीत,
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफ़िल में है
ए शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार,
अब तेरी हिम्मत का चरचा गैर की महफ़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
Rohit Wasonhttp://www.blogger.com/profile/07669803884215474699noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-16487551.post-9376401479717714072007-06-01T22:12:00.000-04:002007-06-02T11:21:47.185-04:00अब छलकते हुए साग़र नहीं देखे जातेबेग़म अख्तर ने इस पेहेले-ही से खूबसूरत ग़ज़ल को बखूबी निखारा है:
अब छलकते हुए साग़र नहीं देखे जाते
तौबा के बाद ये मन्ज़र नहीं देखे जाते
मस्त कर के मुझे औरों को लगा मुँह साक़ी
ये करम होश में रहकर नहीं देखे जाते
साथ हर एक को इस राह में चलना होगा
इश्क़ में रहज़न-ओ-रहबर नहीं देखे जाते
हमने देखा है ज़माने का बदलना लेकिन
उनके बदले हुए तेवर नहीं देखे जाते
(अली अहमद जलीली)Rohit Wasonhttp://www.blogger.com/profile/07669803884215474699noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-16487551.post-73042968965862471082007-06-01T21:34:00.001-04:002007-06-01T23:05:13.309-04:00रफ़्ता-रफ़्ता वो मेरीमेहंदी हसन की शहद-सी आवाज़ में ये ग़ज़ल और भी मीठी लगती है:
रफ़्ता-रफ़्ता वो मेरी हस्ती का सामाँ हो गए
पेहले जाँ, फिर जान-ए-जाँ फिर जान-ए-जाना हो गए
दिन-ब-दिन बढने लगीं हुस्न की रानाइयाँ
पेहले गुल, फिर गुल-बदन फिर गुल-बदामाँ गए
आप तो नज़दीक से नज़दीकतर आते गए
पेहले दिल, फिर दिलरुबा, फिर दिल के मेहमाँ हो गए
(तसलीम फ़ाज़ली)Rohit Wasonhttp://www.blogger.com/profile/07669803884215474699noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-16487551.post-84454947604176244422007-05-20T23:26:00.000-04:002007-06-01T22:48:52.305-04:00कल चौधवीं की रात थीकल चौधवीं की रात थी, शब-भर रहा चर्चा तेरा
कुछ ने कहा ये चाँद है, कुछ ने कहा चेहरा तेरा
हम भी वहाँ मौजूद थे, हम से भी सब पूछा किये
हम हँस दिये, हम चुप रहे, मन्ज़ूर था पर्दा तेरा
इस शहर में किससे मिलें, हमसे तो छूटीं मेहफ़िलें
हर शक़्स तेरा नाम ले, हर शक़्स दीवाना तेरा
कूचे को तेरे छोड कर जोगी ही बन जायें मगर
जँगल तेरे, परबत तेरे, बस्ती तेरी सहरा तेरा
(सभी कुछ तो तेरा है!)
हम और रस्म-ए-बन्दग़ी, Rohit Wasonhttp://www.blogger.com/profile/07669803884215474699noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-16487551.post-4719274927657987022007-05-10T22:11:00.001-04:002007-06-01T22:43:19.042-04:00किसी को दे के दिल कोईचचा कितने गहरे हैं, उनके शेरों से पूछो:
किसी को दे के दिल कोई नवा-सन्ज-ए फ़ुग़ां क्यूं हो
न हो जब दिल ही सीने में तो फिर मुंह में ज़बां क्यूं हो
(जब किसी को दिल ही दे दिया, तो उसका रोना कैसा? आखिर सीने में दिल नहीं, तो मुँह में ज़बान भी क्यूँ हो?)
वह अपनी ख़ू न छोड़ेंगे हम अपनी वज़ा क्यूं छोड़ें
सुबुक-सर बन के क्या पूछें कि हम से सर-गिरां क्यूं हो
(आशिक़ और महबूब दोनों अपनी आन के पक्के हैं. कोई भी दूसरेRohit Wasonhttp://www.blogger.com/profile/07669803884215474699noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-16487551.post-26964172495734125912007-04-03T18:46:00.001-04:002007-06-01T23:05:38.954-04:00अब तो घबरा के ये कहते हैं के मर जायेंगेज़ौक़ को मैने पहले कभी पढा नहीं था, पर ये मोती जब मिला तो नायाब-सा लगा:
अब तो घबरा के ये कहते हैं के मर जायेंगे
मरके भी चैन न पया, तो किधर जायेंगे
तुम ने ठहराई अगर ग़ैर के घर जाने की
तो इरादे यहाँ कुछ और ठहर जायेंगे
हम नहीं वो जो करें खून का दावा तुझपर
बलकि पूछेगा खुदा भी, तो मुक़र जायेंगे
(आशिक़ की वफादारी पे ग़ौर करें: महबूब के हाथों क्त्ल होने के बाद भी कोई गिला नहीं. उलटा खुदा को भी अपने क्त्ल Rohit Wasonhttp://www.blogger.com/profile/07669803884215474699noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-16487551.post-12496577528207453292007-03-21T20:11:00.000-04:002007-06-01T22:48:13.542-04:00नज़्म उलझी हुई है सीने मेंगुलज़ार नज़्म लिखते हुए क़लम ही तोड देते हैं:
नज़्म उलझी हुई है सीने में
मिसरे अटके हुए हैं होंठों पर
उडते फिरते हैं तितलियों की तरह
लफ़्ज़ काग़ज़ पे बैठते ही नहीं
कब से बैठा हूँ मैं जानम
सादे काग़ज़ पे लिखके नाम तेरा
बस तेरा नाम ही मुक़म्मल है
इससे बेहतर भी नज़्म क्या होगी
(गुलज़ार)Rohit Wasonhttp://www.blogger.com/profile/07669803884215474699noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-16487551.post-37068009456286277112007-03-16T22:23:00.000-04:002007-06-01T22:56:07.080-04:00दिल में इक लहर-सी उठी है अभीग़ुलाम भाई की आवाज़, और ऐसी बेहतरीन शायरी के हम क्यूँ न ग़ुलाम हों?
दिल में इक लहर-सी उठी है अभी
कोई ताज़ा हवा चली है अभी
शोर बरपा है खाना-ए-दिल में
कोई दीवार-सी गिरी है अभी
कुछ तो नाज़ुक़ मिजाज़ हैं हम भी
और ये चोट भी नई है अभी
भरी दुनिया में जी नहीं लगता
जाने किस चीज़ की कमी है अभी
तू शरीक़-ए-सुखन नहीं है तो क्या
हम-सुखन तेरी खामोशी है अभी
याद के बे-निशाँ जज़ीरों से
तेरी आवाज़ आ रही है अभी
शहर की Rohit Wasonhttp://www.blogger.com/profile/07669803884215474699noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-16487551.post-90596431077281681262007-03-05T10:43:00.000-05:002007-06-01T22:54:12.849-04:00दिखाई दिये यूँ, के बेखुद कियाकुछ ग़ज़लें फ़िल्मी गीत होने की वजह से ग़ज़लें नहीं लगतीं. ये ग़ज़ल उन्ही में से है. मीर की ग़ज़ल होने की वजह से गहरी भी है, और रस भरी भी:
दिखाई दिये यूँ, के बेखुद किया
हमें आपसे भी जुदा कर चले
(आप हमें यूँ दिखाई दिये, के बेखुद कर दिया. इतना, के हम आपसे मिलना भी भूल गए, और आपसे जुदा होते चले गए)
जबीं सजदा करते ही करते गई
हक़-ए-बन्दग़ी हम अदा कर चले
परस्तिश किया तक, के ऐ बुत तुझे
नज़र में सभों की खुदा कर Rohit Wasonhttp://www.blogger.com/profile/07669803884215474699noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-16487551.post-37829705854682651762007-02-25T10:54:00.001-05:002007-06-01T23:03:12.736-04:00अफ़साना लिख रही हूँशक़ील के सादा लफ़्ज़ों का कमाल:
अफ़साना लिख रही हूँ दिल-ए-बेक़रार का
आँखों में रँग भरके तेरे इन्तज़ार का
जब तू नहीं तो कुछ भी नहीं है बहार में
जी चाहता है मुँह भी न देखूँ बहार का
हासिल हैं यूँ तो मुझको ज़माने की दौलतें
लेकिन नसीब लाई हूँ इक सोगवार का
आजा के अब तो आँखों में आँसू भी आ गए
साग़र छलक उठा मेरे सब्र-ओ-क़रार का
(शक़ील बदायूनी)Rohit Wasonhttp://www.blogger.com/profile/07669803884215474699noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-16487551.post-25246597451370463342007-02-08T19:09:00.001-05:002007-06-01T22:49:34.825-04:00मिलती है खू-ए-यार से नार इल्तिहाब मेंचचा का एक और कमाल!
मिलती है खू-ए-यार से नार इल्तिहाब में
क़ाफ़िर हूँ गर न मिलती हो राहत अज़ाब में
(जहन्नुम की आग बिलकुल मेरे महबूब के ग़ुस्से की तरह है. तो क्यूँ न मुझे जहन्नुम मे भी राहत मिले? दरअस्ल, जहन्नुम में राहत न मिले, तो मैं क़ाफ़िर! एक मुसल्मान के लिये क़फ़िर की जगह जहन्नुम में ही होती है, पर चचा ऐसे जहन्नुम की आग में भी राहत पाते हैं, जो महबूब के मिजाज़ की तरह गर्म है!)
कब से हूँ क्या बताऊँ Rohit Wasonhttp://www.blogger.com/profile/07669803884215474699noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-16487551.post-18008594338991880322006-12-05T22:59:00.000-05:002007-06-01T22:57:10.388-04:00आप जिनके क़रीब होते हैंआप जिनके क़रीब होते हैं
वो बडे खुशनसीब होते हैं
जब तबीयत किसी पे आती है
मौत के दिन क़रीब होते हैं
(शायर अपनी बदक़िसमती पे अफ़सोस कर रहा है, के जब जब दिल किसी पे आया, ऐसे वक़्त पे आया के मौत भी क़रीब थी. याने इश्क़ का लुत्फ़ भी पूरा न मिल सका. ग़ौर करने की बात एक और ये है, के 'मौत के दिन क़रीब होते हैं' से मौत के बार-बार आने का इल्म होता है. जो के मुमकिन नहीं. मौत के बार-बार आने से यहाँ मानी हिज्र [जुदाई] Rohit Wasonhttp://www.blogger.com/profile/07669803884215474699noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-16487551.post-55685753202370860732006-12-01T00:01:00.000-05:002007-06-01T22:59:18.547-04:00कहते हैं मुझसे इश्क़ का अफ़साना चाहिएकहते हैं मुझसे इश्क़ का अफ़साना चाहिए
रुसवाई हो गई तुम्हे शरमाना चाहिए
खुद्दार इतनी फ़ितरत-ए-रिन्दाँ न चाहिए
साक़ी ये खुद कहे तुझे पैमाना चाहिए
आशिक़ बग़ैर हुस्न-ओ-जवानी फ़िज़ूल है
जब शम्मा जल रही है तो, परवाना चाहिए
आँखों में दम रुका है किसी के लिए ज़ुरूर
वरना मरीज़-ए-हिज्र को मर जाना चाहिए
वादा था उनके रात के आने का ऐ 'क़मर'
अब चाँद छुप गया उन्हें आ जाना चाहिए
(क़मर जलालवी)Rohit Wasonhttp://www.blogger.com/profile/07669803884215474699noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-16487551.post-16486285406826289372006-11-20T23:58:00.000-05:002007-06-01T22:48:13.543-04:00साँस लेना भी कैसी आदत हैगुलज़ार साहब की आज़ाद शायरी क जवाब है क्या?
साँस लेना भी कैसी आदत है
जिये जाना भी क्या रवायत है
कोई आहट नहीं बदन में कहीं
कोई साया नहीं है आँखों में
पाँव बेहिस हैं, चलते जाते हैं
इक सफ़र है, जो बहता रहता है
कितने बरसों से, कितनी सदियों से
जिए जाते हैं, जिए जाते हैं
आदतें भी अजीब होतीं हैं
('गुलज़ार')Rohit Wasonhttp://www.blogger.com/profile/07669803884215474699noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-16487551.post-6065930547882695022006-10-30T21:46:00.000-05:002007-06-01T22:58:56.378-04:00कभी कहा न किसी सेकभी कहा न किसी से तेरे फ़साने को
न जाने कैसे खबर हो गई ज़माने को
चमन में बर्क़ नहीं छोडती किसी सूरत
तरह-तरह से बनाता हूँ आशियाने को
सुना है ग़ैर की महफ़िल में तुम न जाओगे
कहो तो आज सजा लूँ ग़रीबखाने को
दुआ बहार की माँगी तो इतने फूल खिले
कहीं जगह न मिली मेरे आशियाने को
चमन में जाना तो सय्याद देखकर जाना
अकेला छोडकर आया हूँ आशियाने को
मेरी लहद पे पतँगों का खून होता है
हु़ज़ूर शम्मा ने लाया करें जलाने Rohit Wasonhttp://www.blogger.com/profile/07669803884215474699noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-16487551.post-16134495863783542862006-10-30T21:21:00.000-05:002007-06-01T22:47:05.926-04:00तुम्हारी अँजुमन से उठकेफ़रीदा खानम की मदभरी आवाज़ में पिरोए चन्द सच्चे मोती:
तुम्हारी अँजुमन से उठके दीवाने कहाँ जाते
जो वाबस्ता हुए तुमसे वो अफ़्साने कहाँ जाते
निकलकर दैर-ओ-क़ाबा से अगर मिलता न मैखाना
तो ठुकराए हुए इन्साँ, खुदा जाने कहाँ जाते
तुम्हारी बेरुखी ने लाज रख ली बादाखाने की
तुम आँखों से पिला देते तो पैमाने कहाँ जाते
चलो अच्छा हुआ काम आ गई दीवानग़ी अपनी
वगरना हम ज़माने भर को समझाने कहाँ जाते
'क़तील' अपना मुक़द्दरRohit Wasonhttp://www.blogger.com/profile/07669803884215474699noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-16487551.post-68048076383889075112006-10-17T23:59:00.000-04:002007-06-01T23:01:32.633-04:00कौन कहता है मुहब्बत की ज़बाँ होती हैचँद शेरों में किसी की ज़िन्दग़ी भर की तालीम:
कौन कहता है, मुहब्बत की ज़बाँ होती है
ये हक़ीक़त तो निगाहों से बयाँ होती है
वो न आये तो सताती है खलिश-सी दिल को
वो जो आये तो खलिश और जवाँ होती है
रूह को शाद करे, दिल को जो पुरनूर करे
हर नज़र में ये तनवीर कहाँ होती है
ज़ब्त-ए-सैलाब-ए-मुहब्बत को कहाँ तक रोकें
दिल में जो बात हो आँखों से अयाँ होती है
ज़िन्दग़ी एक सुलगती-सी चिता है 'साहिर'
शोला बनती है न ये Rohit Wasonhttp://www.blogger.com/profile/07669803884215474699noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-16487551.post-64312873214888011872006-10-15T13:44:00.000-04:002007-06-01T22:36:04.258-04:00देर लगी तुम को आने मेंफ़रीदा खानम का एक और जादू:
देर लगी तुम को आने में, शुक़्र है फिर भी आये तो
आस ने दिल का साथ न छोडा, वैसे हम घबराये तो
शफ़क़ धनक महताब घटायें तारे नग़में बिजली फूल
उस दामन में क्या क्या कुछ है, वो दामन हाथ आये तो
चाहत के बदले में हम तो, बेच दें अपनी मर्ज़ी तक
कोई मिले तो दिल का गाहक, कोई हमें अपनाए तो
क्यूँ ये मिहर-अँगेज़ तबस्सुम, मद्द्-ए-नज़र जब कुछ भी नहीं
हाय, कोई अँजान अगर इस धोके में आ जाए तो
Rohit Wasonhttp://www.blogger.com/profile/07669803884215474699noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-16487551.post-15782081430342545422006-10-14T14:57:00.000-04:002007-06-01T22:47:46.863-04:00मस्ताना पिये जामयनोशी पर ग़ुलाम अली की आवाज़ में एक और मोती:
मस्ताना पिये जा, यूँही मस्ताना पिये जा
पैमाना तो क्या चीज़ है, मैखाना पिये जा
कर ग़र्क़ मय-ओ-जाम ग़म-ए-गर्दिश-ए-अय्याम
अब ऐ दिल-ए-नाकाम तू, मैखाना पिये जा
मयनोशी के आदाब से आगाह नहीं तू
जिस तरह कहे साक़ी-ए-मैखाना पिये जा
इस बस्ती में है वहशत-ए-मस्ती ही से हस्ती
दीवाना बन और बादा-ए-दीवाना पिये जा
मैखाने के हँगामें हैं कुछ देर के मेहमाँ
है सुबह क़रीब 'Rohit Wasonhttp://www.blogger.com/profile/07669803884215474699noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-16487551.post-32428092841231419952006-09-10T22:56:00.000-04:002007-06-01T22:54:12.851-04:00देख तो दिल कि जाँ से उठता हैमीर की एक बेहतरीन ग़ज़ल:
देख तो दिल कि जाँ से उठता है
यह धुआँ-सा कहाँ से उठता है
गोर किस दिलजले की है यह फ़लक
शोला इक सुबह याँ से उठता है
खाना-ए-दिल से ज़िन्हार न जा
कोई ऐसे मकाँ से उठता है
नाला सर खेँचता है जब मेरा
शोर इक आसमाँ से उठता है
लडतीं हैं उसकी चश्म-ए-शोख जहाँ
एक आशोब वाँ से उठता है
सुध ले घर की भी शोला-ए-आवाज़
दूद कुछ आशियाँ से उठता है
बैठने कौन दे है फिर उसको
जो तेरे आसताँ से उठता Rohit Wasonhttp://www.blogger.com/profile/07669803884215474699noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-16487551.post-1144725444494319652006-08-24T01:54:00.000-04:002007-06-02T11:17:20.680-04:00चुपके-चुपके रात दिनइस ग़ज़ल के बारे में कुछ भी कहना, खुद को शर्मिन्दा करने के बराबर होगा:
चुपके-चुपके रात दिन, आँसू बहाना याद है
हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है
बा'हज़ार'हा इज़्तिराब-ओ सद'हज़ार'हा इश्तियाक़
तुझसे वो पेहले-पेहल दिल का लगाना याद है
तुझसे मिलते ही वो बेबाक़ हो जाना मेरा
और तेरा दाँतों में वो, उँगली दबाना याद है
खेंच लेना वो मेरा परदे का कोना दफ़-अतन
और दुपट्टे से तेरा वो, मुँह छुपाना याद है
जान कर Rohit Wasonhttp://www.blogger.com/profile/07669803884215474699noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-16487551.post-1156215548715092092006-08-24T00:55:00.000-04:002007-06-01T22:43:19.044-04:00हरेक बात पे कहते हो तुमहरेक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्ही कहो कि यह अनदाज़-ए गुफ़तगू क्या है
न शोले में यह करिशमा न बर्क़ में यह अदा
कोई बताओ कि वह शोख़-ए तुनद-ख़ू क्या है
यह रश्क है कि वह होता है हम-सुख़न तुम से
वगरना ख़ौफ़-ए बद-आमोज़ी-ए अदू क्या है
(हमें इस बात का कोई खौफ़ नहीं के वह तुम्हारे कान भरे
बस तुमसे बात करता है, इसी का रश्क है)
चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन
हमारे जेब को अब हाजत-ए रफ़ू क्या है
(हम Rohit Wasonhttp://www.blogger.com/profile/07669803884215474699noreply@blogger.com