चचा का एक और कमाल!
मिलती है खू-ए-यार से नार इल्तिहाब में
क़ाफ़िर हूँ गर न मिलती हो राहत अज़ाब में
(जहन्नुम की आग बिलकुल मेरे महबूब के ग़ुस्से की तरह है. तो क्यूँ न मुझे जहन्नुम मे भी राहत मिले? दरअस्ल, जहन्नुम में राहत न मिले, तो मैं क़ाफ़िर! एक मुसल्मान के लिये क़फ़िर की जगह जहन्नुम में ही होती है, पर चचा ऐसे जहन्नुम की आग में भी राहत पाते हैं, जो महबूब के मिजाज़ की तरह गर्म है!)
कब से हूँ क्या बताऊँ जहान-ए-खराब में
शबहा-ए-हिज्र को भी रखूँ गर हिसाब में
(मेरी उम्र क्या होगी? अपने बद्क़िसमत दिनों क क्या हिसाब दूँ? जुदाई की रातें भी गिनूँ क्या?)
ता फिर न इन्तज़ार में नींद आए उम्र भर
आने का अहद कर गए आए जो ख्वाब में
(वो ख्वाब में आये, और आने का वादा कर गये. जब आँख खुली, तो वो न थे, पर अब इन्तज़ार में नींद भी नहीं आ रही - कहीं वो फिर ख्वाब में ही तो नहीं आने वाले थे? भई वाह!)
क़ासिद के आते-आते खत इक और लिख रखूँ
मैं जानता हूँ, जो वो लिखेंगे जवाब में
(बेहतरीन शेर! महबूब की फ़ितरत से मैं इतनी अच्छी तरह वाक़िफ़ हूँ, के हर बात पे उनका क्या जवाब होगा, मैं जानता हूँ. तो क़ासिद के आने का इन्तज़ार न करके उनके खत का जवाब ही लिख डालूँ)
मुझ तक कब उनकी बज़्म में आता था दौर-ए-जाम
साक़ी ने कुझ मिला न दिया हो शराब में
(एक और बेहतरीन शेर!! उनकी महफ़िल में ऐसा पेहले तो कभी न हुआ था के मुझे जाम नसीब होता. आज ये जाम मुझ तक कैसे आ गया? डरता हूँ के कहीं साक़ी ने इसमें कुछ मिला तो नहीं दिया?)
जो मुनकिर-ए-वफ़ा हो फ़रेब उसपे क्या चले
क्यूँ बदगुमाँ हूँ दोस्त से दुशमन के बाब में
(मेरा महबूब तो वफ़ा में यक़ीन ही नहीं करता. तो रक़ीब जितना भी चाहे, उसपे वफ़ा क फ़रेब नहीं कर सकता. तो मैं महबूब पे शक़ ही क्यूँ करूँ?)
मैं मुज़तरिब हूँ वस्ल में खौफ़-ए-रक़ीब से
डाला है तुमको वहम ने किस पेच-ओ-ताब में
(मैं भला मिलन के वक़्त क्यूँ रक़ीब का डर करूँ? किस वहम में पडी हो तुम?)
मैं और हिज़्ज़-ए-वस्ल खुदा-साज़ बात है
जाँ नज़र देनी भूल गया इज़्तिराब में
(मैं और वस्ल की खुशी! ये तो खुदा की ही क़रामात है! अरे! मैं इस खुशी में अपनी जाँ फ़िदा करना ही भूल गया)
है तेवरी चढी हुई अन्दर नक़ाब के
है इक शिकन पडी हुई तर्फ-ए-नक़ाब में
(तुम्हारे चेहरे पे ज़रूर तेवर चढे हुए है. इतने गहरे, के नक़ाब के ऊपर भी सिलवट पड गई!)
लाखों लगाव, इक चुराना निगाह का
लाखों बनाव, इक बिगडना इताब में
(तेरे लाखों लगाव, और एक नज़र चुराने की अदा, दोनो बराबर हैं! लाखों बनाव की अदाएँ, तेरे एक ग़ुस्से के बराबर हैं!)
वो नाला दिल में खस बराबर जगह न पाए
जिस नाले से शिगाफ़ पडे आफ़ताब में
(मेरे शिक़वे को उनके दिल में तिनके बराबर जगह नहीं मिलती! ऐसा शिक़वा जिससे सूरज में घाव हो जाए! वाह!)
वो सिह्र मुद्द-आ तलबी में न काम आए
जिस सिह्र से सफ़ीना रवाँ हो सराब में
(ऐसा जादू, जो सराब (मृगतृष्णा) जहाज़ बहा दे, ऐसा जादू यहाँ (मेहबूब के मामले में) बिलकुल काम नहीं आ रहा!)
'ग़ालिब' छुटी शराब पर अब भी कभी-कभी
पीता हूँ रोज़-ए-अब्र-ओ-शब-ए-माहताब में
(चचा पीना नहीं छोड सकते!!)
(मिर्ज़ा ग़ालिब)
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हरेक बात पे कहते हो तुम
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ग़ालिब
हरेक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्ही कहो कि यह अनदाज़-ए गुफ़तगू क्या है
न शोले में यह करिशमा न बर्क़ में यह अदा
कोई बताओ कि वह शोख़-ए तुनद-ख़ू क्या है
यह रश्क है कि वह होता है हम-सुख़न तुम से
वगरना ख़ौफ़-ए बद-आमोज़ी-ए अदू क्या है
(हमें इस बात का कोई खौफ़ नहीं के वह तुम्हारे कान भरे
बस तुमसे बात करता है, इसी का रश्क है)
चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन
हमारे जेब को अब हाजत-ए रफ़ू क्या है
(हम फटेहाल ही सही, मगर अब कपडे सिलने की ज़रूरत नहीं
हमारे ज़ख्म ही हमारा इलाज हैं, जिनसे कपडे बदन पर चिपके जा रहे हैं)
जला है जिस्म जहां दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख जुसतजू क्या है
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल
जब आंख से ही न टपका तो फिर लहू क्या है
(आशिक़ का लहू कभी सिर्फ़ रगों मे दौडकर नहीं रह जाता,
वह आँख से टपकता है - तब ही लहू कहलाता है)
वह चीज़ जिस के लिये हम को हो बिहिशत अज़ीज़
सिवा-एबादा-ए गुलफ़ाम-ए मुश्क-बू क्या है
(जन्नत में मुझे सबसे अज़ीज़ चीज़ भला
खुश्बूदार गुलाबी मय से ज़्यादा क्या होगी?)
पियूं शराब अगर ख़ुम भी देख लूं दो चार
यह शीशा-ओ-क़दा-ओ- कूज़ा-ओ- सबू क्या है
रही न ताक़त-ए गुफ़तार और अगर हो भी
तो किस उम्मीद पह कहिये कि आरज़ू क्या है
हुआ है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता
वगरनह शहर में ग़ालिब की आबरू क्या है
(मिर्ज़ा ग़ालिब)
तुम्ही कहो कि यह अनदाज़-ए गुफ़तगू क्या है
न शोले में यह करिशमा न बर्क़ में यह अदा
कोई बताओ कि वह शोख़-ए तुनद-ख़ू क्या है
यह रश्क है कि वह होता है हम-सुख़न तुम से
वगरना ख़ौफ़-ए बद-आमोज़ी-ए अदू क्या है
(हमें इस बात का कोई खौफ़ नहीं के वह तुम्हारे कान भरे
बस तुमसे बात करता है, इसी का रश्क है)
चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन
हमारे जेब को अब हाजत-ए रफ़ू क्या है
(हम फटेहाल ही सही, मगर अब कपडे सिलने की ज़रूरत नहीं
हमारे ज़ख्म ही हमारा इलाज हैं, जिनसे कपडे बदन पर चिपके जा रहे हैं)
जला है जिस्म जहां दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख जुसतजू क्या है
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल
जब आंख से ही न टपका तो फिर लहू क्या है
(आशिक़ का लहू कभी सिर्फ़ रगों मे दौडकर नहीं रह जाता,
वह आँख से टपकता है - तब ही लहू कहलाता है)
वह चीज़ जिस के लिये हम को हो बिहिशत अज़ीज़
सिवा-एबादा-ए गुलफ़ाम-ए मुश्क-बू क्या है
(जन्नत में मुझे सबसे अज़ीज़ चीज़ भला
खुश्बूदार गुलाबी मय से ज़्यादा क्या होगी?)
पियूं शराब अगर ख़ुम भी देख लूं दो चार
यह शीशा-ओ-क़दा-ओ- कूज़ा-ओ- सबू क्या है
रही न ताक़त-ए गुफ़तार और अगर हो भी
तो किस उम्मीद पह कहिये कि आरज़ू क्या है
हुआ है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता
वगरनह शहर में ग़ालिब की आबरू क्या है
(मिर्ज़ा ग़ालिब)
दिल-ए नादां तुझे हुआ क्या है
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जगजीत सिँह,
ग़ालिब
छोटी-बहर की ये ग़ज़ल, चचा का एक और कमाल है:
दिल-ए नादां तुझे हुआ क्या है
अख़िर इस दर्द की दवा क्या है
हम हैं मुशताक़ और वह बेज़ार
या इलाही यह माजरा क्या है
मैं भी मुंह में ज़बान रखता हूं
काश पूछो कि मुदद`आ क्या है
जब कि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद
फिर यह हँगामा ऐ ख़ुदा क्या है
यह परी-चेहरा लोग कैसे हैं
ग़मज़ा-ओ-इशवा-ओ-अदा क्या है
(ये दुनिया में इतने सुँदर इन्सान कौन हैं?
और इनकी दिलक़श अदाओं का क्या मतलब है?)
शिकन-ए ज़ुलफ़-ए अनबरीं कयूं है
निगह-ए चशम-ए सुरमा-सा क्या है
सबज़ा-ओ-गुल कहां से आए हैं
अब्र क्या चीज़ है हवा क्या है
हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है
हां भला कर तेरा भला होगा
और दरवेश की सदा क्या है
(ऐ खूबसूरत महबूब! कुछ हमपे भी नज़र-ए-करम कर
खुदा तेरा भी भला करे)
जान तुम पर निसार करता हूं
मैं नहीं जानता दुआ क्या है
('मेरी जान तुम्हारे सदक़े' की दुआ तो सब देते हैं
पर जीते रहकर ऐसा कहना भला किस काम का?
मैं तुमपर मरकर यह साबित किये देता हूँ
के मैने तुमपर जान निसार की)
मैं ने माना कि कुछ नहीं 'ग़ालिब'
मुफ़्त हाथ आए तो बुरा क्या है
(मेरी क़ीमत भले कुछ नहीं, चलो एक सौदा करे लें
मुझे मुफ़्त में अपना ग़ुलाम ही समझकर अपना लो,
मेरे इश्क़ को इससे बडा हासिल भला क्या होगा?)
(मिर्ज़ा ग़ालिब)
दिल-ए नादां तुझे हुआ क्या है
अख़िर इस दर्द की दवा क्या है
हम हैं मुशताक़ और वह बेज़ार
या इलाही यह माजरा क्या है
मैं भी मुंह में ज़बान रखता हूं
काश पूछो कि मुदद`आ क्या है
जब कि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद
फिर यह हँगामा ऐ ख़ुदा क्या है
यह परी-चेहरा लोग कैसे हैं
ग़मज़ा-ओ-इशवा-ओ-अदा क्या है
(ये दुनिया में इतने सुँदर इन्सान कौन हैं?
और इनकी दिलक़श अदाओं का क्या मतलब है?)
शिकन-ए ज़ुलफ़-ए अनबरीं कयूं है
निगह-ए चशम-ए सुरमा-सा क्या है
सबज़ा-ओ-गुल कहां से आए हैं
अब्र क्या चीज़ है हवा क्या है
हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है
हां भला कर तेरा भला होगा
और दरवेश की सदा क्या है
(ऐ खूबसूरत महबूब! कुछ हमपे भी नज़र-ए-करम कर
खुदा तेरा भी भला करे)
जान तुम पर निसार करता हूं
मैं नहीं जानता दुआ क्या है
('मेरी जान तुम्हारे सदक़े' की दुआ तो सब देते हैं
पर जीते रहकर ऐसा कहना भला किस काम का?
मैं तुमपर मरकर यह साबित किये देता हूँ
के मैने तुमपर जान निसार की)
मैं ने माना कि कुछ नहीं 'ग़ालिब'
मुफ़्त हाथ आए तो बुरा क्या है
(मेरी क़ीमत भले कुछ नहीं, चलो एक सौदा करे लें
मुझे मुफ़्त में अपना ग़ुलाम ही समझकर अपना लो,
मेरे इश्क़ को इससे बडा हासिल भला क्या होगा?)
(मिर्ज़ा ग़ालिब)
ये न थी हमारी क़िस्मत
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जगजीत सिँह,
ग़ालिब
चचा का बेहतरीन कमाल:
ये न थी हमारी क़िस्मत के विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इन्तज़ार होता
तेरे वादे पर जिये हम, तो ये जान झूठ जाना
कि ख़ुशी से मर न जाते अगर एतबार होता
(तेरे वादे के सहारे हम जी लिये
तो उसे झूठ समज कर
क्यूँकि अगर सच मान लिया होता
तो खुशी के मारे मर ही गये होते)
तेरी नाज़ुकी से जाना कि बंधा था अहद बोदा
कभी तू न तोड़ सकता अगर उसतवार होता
कोई मेरे दिल से पूछे, तेरे तीर-ए-नीमक़श को
ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता
ये कहां की दोस्ती है कि बने हैं दोस्त नासेह
कोई चारा-साज़ होता कोई ग़मगुसार होता
रग-ए-सँग से टपकता वह लहू कि फिर न थमता
जिसे ग़म समझ रहे हो यह अगर शरार होता
(पत्थर के दिल में भी रगें होतीं, और उससे लहू बहता,
अगर दिल में छुपा ग़म चिन्गारी कि शक़्ल ले-लेता ज्यों दिल पे चोट करने से लहू निकलता है, और पत्थर पे, चिन्गारी!)
ग़म अगरचे जां-गुसिल है पह कहां बचें कि दिल है
ग़म-ए-इशक़ गर न होता ग़म-ए-रोज़गार होता
(मुझे ग़म तो होना हि था, इससे कोई छुटकारा नहीं
इश्क़ का न होता, तो रोज़गार का होता)
कहूँ किस से मैं कि क्या है शब-ए-ग़म बुरी बला है
मुझे कया बुरा था मरना अगर एक बार होता
(ग़म की रात का क्या बताऊँ? एक मौत तो सह लेता
बार-बार मरना गवारा नहीं)
हुए मर के हम जो रुसवा हुए कयूं न ग़र्क़-ए-दरया
न कभी जनाज़ा उठता न कहीं मज़ार होता
(एक मुसल्मान के लिये दरिया में मरना नागवारा है,
क्यूँकि जन्नत नसीब होने के लिये, पहले कब्र नसीब होना ज़रूरी है
मगर वो भी मुझे गवारा होता
कम-स-कम, वो इस जिल्लत से तो बेहतर होता,
जो मेरे जनाज़े और मज़ार से मुझे मिली है?)
उसे कौन देख सकता कि यगाना है वो यकता
जो दूई की बू भी होती तो कहीं दो चार होता
(मेरा महबूब तो दिखाई ही नहीं देता,
उसकी यकता (oneness) तो बेमिसाल है
क्यूँकि अगर वो ज़रा भी दोगुला होता,
तो कहीं मिल ही जाया करता)
ये मसाइल-ए-तसव्वुफ़, ये तेरा बयान 'ग़ालिब'
तुझे हम वली समझते, जो न बादा-ख़्वार होता
(ऐ ग़ालिब, तुझे हम संत/वली का दर्ज़ा देते
बस एक पीने की आदत खराब है!)
(मिर्ज़ा ग़ालिब)
ये न थी हमारी क़िस्मत के विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इन्तज़ार होता
तेरे वादे पर जिये हम, तो ये जान झूठ जाना
कि ख़ुशी से मर न जाते अगर एतबार होता
(तेरे वादे के सहारे हम जी लिये
तो उसे झूठ समज कर
क्यूँकि अगर सच मान लिया होता
तो खुशी के मारे मर ही गये होते)
तेरी नाज़ुकी से जाना कि बंधा था अहद बोदा
कभी तू न तोड़ सकता अगर उसतवार होता
कोई मेरे दिल से पूछे, तेरे तीर-ए-नीमक़श को
ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता
ये कहां की दोस्ती है कि बने हैं दोस्त नासेह
कोई चारा-साज़ होता कोई ग़मगुसार होता
रग-ए-सँग से टपकता वह लहू कि फिर न थमता
जिसे ग़म समझ रहे हो यह अगर शरार होता
(पत्थर के दिल में भी रगें होतीं, और उससे लहू बहता,
अगर दिल में छुपा ग़म चिन्गारी कि शक़्ल ले-लेता ज्यों दिल पे चोट करने से लहू निकलता है, और पत्थर पे, चिन्गारी!)
ग़म अगरचे जां-गुसिल है पह कहां बचें कि दिल है
ग़म-ए-इशक़ गर न होता ग़म-ए-रोज़गार होता
(मुझे ग़म तो होना हि था, इससे कोई छुटकारा नहीं
इश्क़ का न होता, तो रोज़गार का होता)
कहूँ किस से मैं कि क्या है शब-ए-ग़म बुरी बला है
मुझे कया बुरा था मरना अगर एक बार होता
(ग़म की रात का क्या बताऊँ? एक मौत तो सह लेता
बार-बार मरना गवारा नहीं)
हुए मर के हम जो रुसवा हुए कयूं न ग़र्क़-ए-दरया
न कभी जनाज़ा उठता न कहीं मज़ार होता
(एक मुसल्मान के लिये दरिया में मरना नागवारा है,
क्यूँकि जन्नत नसीब होने के लिये, पहले कब्र नसीब होना ज़रूरी है
मगर वो भी मुझे गवारा होता
कम-स-कम, वो इस जिल्लत से तो बेहतर होता,
जो मेरे जनाज़े और मज़ार से मुझे मिली है?)
उसे कौन देख सकता कि यगाना है वो यकता
जो दूई की बू भी होती तो कहीं दो चार होता
(मेरा महबूब तो दिखाई ही नहीं देता,
उसकी यकता (oneness) तो बेमिसाल है
क्यूँकि अगर वो ज़रा भी दोगुला होता,
तो कहीं मिल ही जाया करता)
ये मसाइल-ए-तसव्वुफ़, ये तेरा बयान 'ग़ालिब'
तुझे हम वली समझते, जो न बादा-ख़्वार होता
(ऐ ग़ालिब, तुझे हम संत/वली का दर्ज़ा देते
बस एक पीने की आदत खराब है!)
(मिर्ज़ा ग़ालिब)
आह को चाहिये
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जगजीत सिँह,
ग़ालिब
आह को चाहिये इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक
दाम-ए हर मौज में है हलक़ा-ए सद काम-ए निहँग
देखें कया गुज़रे है क़तरे पे गुहर होते तक
आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब
दिल का क्या रँग करूं ख़ून-ए जिगर होते तक
हम ने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन
ख़ाक हो जाएंगे हम तुम को ख़बर होते तक
परतव-ए-खुर से है शबनम को फ़ना की तालीम
मैं भी हूं एक इनायत की नज़र होते तक
यक नज़र बेश नहीं फ़ुरसत-ए हस्ती, ग़ाफ़िल
गरमी-ए बज़्म है इक रक़स-ए-शरर होते तक
ग़म-ए हस्ती का 'असद' किस से हो जुज़-मर्ग इलाज
शमा हर रँग में जलती है सहर होते तक
(मिर्ज़ा ग़ालिब)
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक
दाम-ए हर मौज में है हलक़ा-ए सद काम-ए निहँग
देखें कया गुज़रे है क़तरे पे गुहर होते तक
आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब
दिल का क्या रँग करूं ख़ून-ए जिगर होते तक
हम ने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन
ख़ाक हो जाएंगे हम तुम को ख़बर होते तक
परतव-ए-खुर से है शबनम को फ़ना की तालीम
मैं भी हूं एक इनायत की नज़र होते तक
यक नज़र बेश नहीं फ़ुरसत-ए हस्ती, ग़ाफ़िल
गरमी-ए बज़्म है इक रक़स-ए-शरर होते तक
ग़म-ए हस्ती का 'असद' किस से हो जुज़-मर्ग इलाज
शमा हर रँग में जलती है सहर होते तक
(मिर्ज़ा ग़ालिब)
अब मैं राशन की क़तारों में नज़र आता हूँ
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खलील,
जगजीत सिँह
ताज़ा ज़माने की खस्ता-हालत-शहरी ज़िन्दग़ी के बयान का बेह्तरीन नमूना:
अब मैं राशन की क़तारों में नज़र आता हूँ
अपने खेतों से बिछडने की सज़ा पाता हूँ
इतनी महँगाई के बाज़ार से कुछ लाता हूँ
अपने बच्चों में उसे बाँट के शरमाता हूँ
अपनी नीँदों का लहू पोँछने की कोशिश में
जागते-जागते थक जाता हूँ, सो जाता हूँ
कोई चादर समझ के खीँच न ले फिर से 'खलील'
मैँ क़फ़न ओढ के 'फ़ुटपाथ्' पे सो जाता हूँ
(खलील धनतेजवी)
अब मैं राशन की क़तारों में नज़र आता हूँ
अपने खेतों से बिछडने की सज़ा पाता हूँ
इतनी महँगाई के बाज़ार से कुछ लाता हूँ
अपने बच्चों में उसे बाँट के शरमाता हूँ
अपनी नीँदों का लहू पोँछने की कोशिश में
जागते-जागते थक जाता हूँ, सो जाता हूँ
कोई चादर समझ के खीँच न ले फिर से 'खलील'
मैँ क़फ़न ओढ के 'फ़ुटपाथ्' पे सो जाता हूँ
(खलील धनतेजवी)
तेरी खुशबू में बसे खत
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जगजीत सिँह,
राजेन्द्रनाथ रहबर
तेरी खुशबू में बसे खत, मैं जलाता कैसे
प्यार में डूबे हुये खत, मैं जलाता कैसे
तेरे हाथों के लिखे खत, मैं जलाता कैसे
तेरे खत आज मैं, गँगा में बहा आया हूँ
आग बहते हुए पानी में लगा आया हूँ
जिनको दुनिया की निगाहों से छुपाये रखा
जिन को इक उम्र कलेजे से लगाये रखा
दीन जिनको, जिनहें ईमान बनाये रखा
तूने दुनिया की निगाहों से जो बचकर लिखे
साल-हा-साल मेरे नाम बराबर लिखे
कभी दिन में तो कभी रात में उठकर लिखे
तेरी खुशबू में बसे खत, मैं जलाता कैसे
प्यार में डूबे हुये खत, मैं जलाता कैसे
तेरे हाथों के लिखे खत, मैं जलाता कैसे
तेरे खत आज मैं, गँगा में बहा आया हूँ
आग बहते हुए पानी में लगा आया हूँ
(रजेन्द्रनाथ रहबर)
प्यार में डूबे हुये खत, मैं जलाता कैसे
तेरे हाथों के लिखे खत, मैं जलाता कैसे
तेरे खत आज मैं, गँगा में बहा आया हूँ
आग बहते हुए पानी में लगा आया हूँ
जिनको दुनिया की निगाहों से छुपाये रखा
जिन को इक उम्र कलेजे से लगाये रखा
दीन जिनको, जिनहें ईमान बनाये रखा
तूने दुनिया की निगाहों से जो बचकर लिखे
साल-हा-साल मेरे नाम बराबर लिखे
कभी दिन में तो कभी रात में उठकर लिखे
तेरी खुशबू में बसे खत, मैं जलाता कैसे
प्यार में डूबे हुये खत, मैं जलाता कैसे
तेरे हाथों के लिखे खत, मैं जलाता कैसे
तेरे खत आज मैं, गँगा में बहा आया हूँ
आग बहते हुए पानी में लगा आया हूँ
(रजेन्द्रनाथ रहबर)
बात निकलेगी तो फिर
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Nazm,
जगजीत सिँह,
क़फ़ील आज़र
बात निकलेगी तो फिर दूर तलक़ जायेगी
लोग बेवजह उदासी का सबब पूछेंगे
ये भी पूछेंगे के तुम इतने परेशाँ क्यूँ हो
उँगलियाँ उठेंगी सूखे हुये बालों की तरफ़
इक नज़र देखेंगे गुज़रे हुये सालों की तरफ़
चूडियों पर भी कई तन्ज़ किये जायेंगे
काँपते हाथों पे भी फ़िक़रे क़से जायेंगे
लोग ज़ालिम हैं, हरेक बात का ताना देंगे
बातों-बातों मे मेरा ज़िक़्र भी ले आयेंगे
उनकी बातों क ज़रा-सा भी असर मत लेना
वर्ना चेहरे के तासुर से समझ जायेंगे
चाहे कुछ भी हो सवालात न करना उनसे
मेरे बारे में कोई बात न करना उनसे
बात निकलेगी तो फिर दूर तलक़ जायेगी
(क़फील आज़र)
लोग बेवजह उदासी का सबब पूछेंगे
ये भी पूछेंगे के तुम इतने परेशाँ क्यूँ हो
उँगलियाँ उठेंगी सूखे हुये बालों की तरफ़
इक नज़र देखेंगे गुज़रे हुये सालों की तरफ़
चूडियों पर भी कई तन्ज़ किये जायेंगे
काँपते हाथों पे भी फ़िक़रे क़से जायेंगे
लोग ज़ालिम हैं, हरेक बात का ताना देंगे
बातों-बातों मे मेरा ज़िक़्र भी ले आयेंगे
उनकी बातों क ज़रा-सा भी असर मत लेना
वर्ना चेहरे के तासुर से समझ जायेंगे
चाहे कुछ भी हो सवालात न करना उनसे
मेरे बारे में कोई बात न करना उनसे
बात निकलेगी तो फिर दूर तलक़ जायेगी
(क़फील आज़र)
हज़ारों ख्वाहिशें ऐसीं
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जगजीत सिँह,
ग़ालिब
ग़ालिब की इस ग़ज़ल मे त'खय्युल (thought) और त'ग़ज़्ज़ुल (prose) दोनो का बेहतरीन नमूना है:
हज़ारों ख्वाहिशें ऐसीं, के हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमाँ, लेकिन फिर भी कम निकले
डरे क्यूँ मेरा क़ातिल क्या रहेगा उसकी गर्दन पर
वो खूँ को चश्म-ए-तर से उम्र भर यूँ दम-ब-दम निकले
निकलना खुल्द से आदम का, सुनते आये हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले
भरम खुल जाये ज़ालिम तेरी क़ामत की दराज़ी का
अगर इस तुर्रा-ए-पुरपेच-ओ-खम का पेच-ओ-खम निकले
अगर लिखवाये कोई उसको खत तो, हमसे लिखवाये
हुई सुबहा और घर से कान पर रखकर क़लम निकले
हुई इस दौर में मनसूब मुझसे बादा-आशामी
फिर आया वो ज़माना जो जहाँ से जाम-ए-जम निकले
हुई जिनसी तव्वक़ो खस्तग़ी की दाद पाने की
वो हमसे भी ज़ियादा खस्ता-ए-तेग़-ए-सितम निकले
मुहब्बत में नही है, फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं, जिस क़ाफ़िर पे दम निकले
ज़रा कर ज़ोर सीने पर के तीर-ए-पुरसितम निकले
जो वो निकले तो दिल निकले, जो दिल निकले तो दम निकले
खुदा के वास्ते परदा न क़ाबे से उठा ज़ालिम
कहीं ऐसा न हो याँ भी वही क़ाफ़िर सनम निकले
कहाँ मैखाने का दरवाज़ा 'ग़ालिब' और कहाँ वाइज़
पर इतना जानते है, कल वो जाता था, के हम निकले
(मिर्ज़ा ग़ालिब)
हज़ारों ख्वाहिशें ऐसीं, के हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमाँ, लेकिन फिर भी कम निकले
डरे क्यूँ मेरा क़ातिल क्या रहेगा उसकी गर्दन पर
वो खूँ को चश्म-ए-तर से उम्र भर यूँ दम-ब-दम निकले
निकलना खुल्द से आदम का, सुनते आये हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले
भरम खुल जाये ज़ालिम तेरी क़ामत की दराज़ी का
अगर इस तुर्रा-ए-पुरपेच-ओ-खम का पेच-ओ-खम निकले
अगर लिखवाये कोई उसको खत तो, हमसे लिखवाये
हुई सुबहा और घर से कान पर रखकर क़लम निकले
हुई इस दौर में मनसूब मुझसे बादा-आशामी
फिर आया वो ज़माना जो जहाँ से जाम-ए-जम निकले
हुई जिनसी तव्वक़ो खस्तग़ी की दाद पाने की
वो हमसे भी ज़ियादा खस्ता-ए-तेग़-ए-सितम निकले
मुहब्बत में नही है, फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं, जिस क़ाफ़िर पे दम निकले
ज़रा कर ज़ोर सीने पर के तीर-ए-पुरसितम निकले
जो वो निकले तो दिल निकले, जो दिल निकले तो दम निकले
खुदा के वास्ते परदा न क़ाबे से उठा ज़ालिम
कहीं ऐसा न हो याँ भी वही क़ाफ़िर सनम निकले
कहाँ मैखाने का दरवाज़ा 'ग़ालिब' और कहाँ वाइज़
पर इतना जानते है, कल वो जाता था, के हम निकले
(मिर्ज़ा ग़ालिब)
यह साल अच्छा है
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श्रेणी/तबक़ा:
जगजीत सिँह,
ग़ालिब
हुस्न-ए-माह गरचे ब-हँगाम-ए-कमाल अच्छा है
उस से मेरा मह-ए खुर्शीद-जमाल अच्छा है
बोसा देते नहीं और दिल पह है हर लहज़ा निगाह
जी में कहते हैं कि मुफ़्त आए तो माल अच्छा है
और बाज़ार से ले आए अगर टूट गया
साग़र-ए जाम से मेरा जाम-ए-सफ़ाल अच्छा है
बे-तलब दें तो मज़ा उस में सिवा मिलता है
वह गदा जिस को न हो ख़ू-ए-सवाल अच्छा है
उन के देखे से जो आ जाती है मुंह पर रौनक़
वह समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है
देखिये पाते हैं `उशशाक़ बुतों से कया फ़ैज़
इक बराहमन ने कहा है कि यह साल अच्छा है
हम-सुख़न तेशे ने फ़रहाद को शीरीं से किया
जिस तरह का कि किसी में हो कमाल अच्छा है
क़तरा दरया में जो मिल जाए तो दरया हो जाए
काम अच्छा है वह जिस का कि म'आल अच्छा है
ख़िज़र सुलतां को रखे ख़ालिक़-ए अकबर सर-सबज़
शाह के बाग़ में यह ताज़ा निहाल अच्छा है
हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के खुश रखने को 'ग़ालिब' यह खयाल अच्छा है
(मिर्ज़ा ग़ालिब)
उस से मेरा मह-ए खुर्शीद-जमाल अच्छा है
बोसा देते नहीं और दिल पह है हर लहज़ा निगाह
जी में कहते हैं कि मुफ़्त आए तो माल अच्छा है
और बाज़ार से ले आए अगर टूट गया
साग़र-ए जाम से मेरा जाम-ए-सफ़ाल अच्छा है
बे-तलब दें तो मज़ा उस में सिवा मिलता है
वह गदा जिस को न हो ख़ू-ए-सवाल अच्छा है
उन के देखे से जो आ जाती है मुंह पर रौनक़
वह समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है
देखिये पाते हैं `उशशाक़ बुतों से कया फ़ैज़
इक बराहमन ने कहा है कि यह साल अच्छा है
हम-सुख़न तेशे ने फ़रहाद को शीरीं से किया
जिस तरह का कि किसी में हो कमाल अच्छा है
क़तरा दरया में जो मिल जाए तो दरया हो जाए
काम अच्छा है वह जिस का कि म'आल अच्छा है
ख़िज़र सुलतां को रखे ख़ालिक़-ए अकबर सर-सबज़
शाह के बाग़ में यह ताज़ा निहाल अच्छा है
हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के खुश रखने को 'ग़ालिब' यह खयाल अच्छा है
(मिर्ज़ा ग़ालिब)
आहिस्ता-आहिस्ता
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अमीर मिनाई,
जगजीत सिँह
जगजीत सिँह की आवाज़ का जादू बडा है या अमीर-भाई की क़लम का, आप ही फैसला करें:
सरक़ती जाये है रुख से नक़ाब, आहिस्ता-आहिस्ता
निकलता आ रहा है आफ़ताब, आहिस्ता-आहिस्ता
जवाँ होने लगे जब वो तो हमसे कर लिया पर्दा
हया यक़-लख्त आयी और शबाब, आहिस्ता-आहिस्ता
शब-ए-फ़ुर्क़त का जागा हूँ फ़रिश्तों, अब तो सोने दो
कभी फ़ुर्सत में कर लेना हिसाब, आहिस्ता-आहिस्ता
सवाल-ए-वस्ल पे उनको उदूं का खौफ़ है इतना
दबे होंठों से देते हैं जवाब, आहिस्ता-आहिस्ता
हमारे और तुम्हारे प्यार में बस फ़र्क़ है इतना
इधर तो जल्दी-जल्दी है वहाँ, आहिस्ता-आहिस्ता
वो बेदर्दी से सर काटें 'अमीर' और मैं कहूँ उनसे
हुज़ूर आहिस्ता-आहिस्ता जनाब, आहिस्ता-आहिस्ता
(अमीर मिनाई)
सरक़ती जाये है रुख से नक़ाब, आहिस्ता-आहिस्ता
निकलता आ रहा है आफ़ताब, आहिस्ता-आहिस्ता
जवाँ होने लगे जब वो तो हमसे कर लिया पर्दा
हया यक़-लख्त आयी और शबाब, आहिस्ता-आहिस्ता
शब-ए-फ़ुर्क़त का जागा हूँ फ़रिश्तों, अब तो सोने दो
कभी फ़ुर्सत में कर लेना हिसाब, आहिस्ता-आहिस्ता
सवाल-ए-वस्ल पे उनको उदूं का खौफ़ है इतना
दबे होंठों से देते हैं जवाब, आहिस्ता-आहिस्ता
हमारे और तुम्हारे प्यार में बस फ़र्क़ है इतना
इधर तो जल्दी-जल्दी है वहाँ, आहिस्ता-आहिस्ता
वो बेदर्दी से सर काटें 'अमीर' और मैं कहूँ उनसे
हुज़ूर आहिस्ता-आहिस्ता जनाब, आहिस्ता-आहिस्ता
(अमीर मिनाई)
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