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दिखाई दिये यूँ, के बेखुद किया

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कुछ ग़ज़लें फ़िल्मी गीत होने की वजह से ग़ज़लें नहीं लगतीं. ये ग़ज़ल उन्ही में से है. मीर की ग़ज़ल होने की वजह से गहरी भी है, और रस भरी भी:

दिखाई दिये यूँ, के बेखुद किया
हमें आपसे भी जुदा कर चले
(आप हमें यूँ दिखाई दिये, के बेखुद कर दिया. इतना, के हम आपसे मिलना भी भूल गए, और आपसे जुदा होते चले गए)

जबीं सजदा करते ही करते गई
हक़-ए-बन्दग़ी हम अदा कर चले

परस्तिश किया तक, के ऐ बुत तुझे
नज़र में सभों की खुदा कर चले

बहुत आरज़ू थी, गली की तेरी
सो याँ से लहू में नहा कर चले

फ़क़ीराना आये सदा कर चले
मिया खुश रहो हम दुआ कर चले

जो तुझ बिन न जीने का कहते थे हम
सो उस अहद को अब वफ़ा कर चले
(देख आज हम मर रहे हैं. तेरे बिन न जीने की जो क़समें खाईं थी, वो आज निबाह ही दीं)

कोई नाउम्मीद न करदे निगाह
सो तुम हमसे मुँह भी छुपा कर चले

(मीर तक़ी 'मीर')

देख तो दिल कि जाँ से उठता है

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मीर की एक बेहतरीन ग़ज़ल:

देख तो दिल कि जाँ से उठता है
यह धुआँ-सा कहाँ से उठता है

गोर किस दिलजले की है यह फ़लक
शोला इक सुबह याँ से उठता है

खाना-ए-दिल से ज़िन्हार न जा
कोई ऐसे मकाँ से उठता है

नाला सर खेँचता है जब मेरा
शोर इक आसमाँ से उठता है

लडतीं हैं उसकी चश्म-ए-शोख जहाँ
एक आशोब वाँ से उठता है

सुध ले घर की भी शोला-ए-आवाज़
दूद कुछ आशियाँ से उठता है

बैठने कौन दे है फिर उसको
जो तेरे आसताँ से उठता है

यूँ उठे आह उस गली से हम
जैसे कोई जहाँ से उठता है

इश्क़ इक 'मीर' भारी पत्थर है
बोझ कब नातवाँ से उठता है

(मीर तक़ी 'मीर')

इब्तिदा-ए-इश्क़ है

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इब्तिदा-ए-इश्क़ है, रोता है क्या
आगे-आगे देखिये होता है क्या

क़ाफिले में सुबह के इक शोर है
यानी ग़ाफ़िल हम चले, सोता है क्या

सब्ज़ होती ही नहीं ये सर-ज़मीं
तुख्म-ए-ख्वाहिश दिल में तू बोता है क्या

ये निशान-ए-इश्क़ हैं जाते नहीं
दाग़ छाती के अबस धोता है क्या

ग़ैरत-ए-युसुफ़ है ये वक़्त-ए-अज़ीज़
'मीर' इसको राएग़ाँ खोता है क्या

(मीर तक़ी 'मीर')