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अफ़साना लिख रही हूँ

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शक़ील के सादा लफ़्ज़ों का कमाल:

अफ़साना लिख रही हूँ दिल-ए-बेक़रार का
आँखों में रँग भरके तेरे इन्तज़ार का

जब तू नहीं तो कुछ भी नहीं है बहार में
जी चाहता है मुँह भी न देखूँ बहार का

हासिल हैं यूँ तो मुझको ज़माने की दौलतें
लेकिन नसीब लाई हूँ इक सोगवार का

आजा के अब तो आँखों में आँसू भी आ गए
साग़र छलक उठा मेरे सब्र-ओ-क़रार का

(शक़ील बदायूनी)

मन तड़पत

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हालिया मरहूम मौसीक़ार 'नौशाद' की याद में यह बेहतरीन नग़मा पेश है.

वैसे मैंने सँगीत सीखा नहीं है, और न हि सँगीत को ज़्यादा समझता हूँ, पर इस गीत की खासियत यह है कि अगर आप इसे 'की-बोर्ड्' पर बजायें, तो नीचे से लेकर ऊपर तक, लगभग सभी सुर इस धुन पर लग जाते हैं:

मन तड़पत हरि दरसन को आज
मोरे तुम बिन बिगड़े सकल काज
आ, विनती करत, हूँ, रखियो लाज, मन तड़पत...

तुम्हरे द्वार का मैं हूँ जोगी
हमरी ओर नज़र कब होगी
सुन मोरे व्याकुल मन की बात, तड़पत हरी दरसन...

बिन गुरू ज्ञान कहाँ से पाऊँ
दीजो दान हरी गुन गाऊँ
सब गुनी जन पे तुम्हारा राज, तड़पत हरी...

मुरली मनोहर आस न तोड़ो
दुख भंजन मोरे साथ न छोड़ो
मोहे दरसन भिक्षा दे दो आज दे दो आज, ...

(शक़ील बदायुनी)

मेरे महबूब

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लखनऊ का शयराना महौल, और वो महफ़िलें - सुभान-अल्लाह!

मेरे महबूब तुझे मेरी मुहब्बत की क़सम
फिर मुझे नरगिसी आँखों का सहारा दे दे
मेरा खोया हुआ रंगीन नज़ारा दे दे,
मेरे महबूब तुझे ...

भूल सकती नहीं आँखें वो सुहाना मंज़र
जब तेरा हुस्न मेरे इश्क़ से टकराया था
और फिर राह में बिखरे थे हज़ारोँ नग़में
मैं वो नग़में तेरी आवाज़ को दे आया था
साज़-ए-दिल को उन्हीं गीतों का सहारा दे दे
मेरा खोया ...

याद है मुझको मेरी उम्र की पहली वो घड़ी
तेरी आँखों से कोई जाम पिया था मैने
मेरे रग रग में कोई बर्क़ सी लहराई थी
जब तेरे मरमरी हाथों को छुआ था मैने
आ मुझे फिर उन्हीं हाथों का सहारा दे दे
मेरा खोया ...

मैने इक बार तेरी एक झलक देखी है
मेरी हसरत है के मैं फिर तेरा दीदार करूँ
तेरे साए को समझ कर मैं हंसीं ताजमहल
चाँदनी रात में नज़रों से तुझे प्यार करूँ
अपनी महकी हुई ज़ुल्फ़ों का सहारा दे दे
मेरा खोया ...

ढूँढता हूँ तुझे हर राह में हर महफ़िल में
थक गये हैं मेरी मजबूर तमन्ना के कदम
आज का दिन मेरी उम्मीद का है आखिरी दिन
कल न जाने मैं कहाँ और कहाँ तू हो सनम
दो घड़ी अपनी निगाहों का सहारा दे दे
मेरा खोया ...

सामने आ के ज़रा पर्दा उठा दे रुख़ से
इक यही मेरा इलाज-ए-ग़म-ए-तन्हाई है
तेरी फ़ुरक़त ने परेशान किया है मुझको
अब मिल जा के मेरी जान भी बन आई है
दिल को भूली हुई यादों का सहारा दे दे
मेरा खोया ...

(शक़ील बदायुनी)