ज़ौक़ को मैने पहले कभी पढा नहीं था, पर ये मोती जब मिला तो नायाब-सा लगा:
अब तो घबरा के ये कहते हैं के मर जायेंगे
मरके भी चैन न पया, तो किधर जायेंगे
तुम ने ठहराई अगर ग़ैर के घर जाने की
तो इरादे यहाँ कुछ और ठहर जायेंगे
हम नहीं वो जो करें खून का दावा तुझपर
बलकि पूछेगा खुदा भी, तो मुक़र जायेंगे
(आशिक़ की वफादारी पे ग़ौर करें: महबूब के हाथों क्त्ल होने के बाद भी कोई गिला नहीं. उलटा खुदा को भी अपने क्त्ल की गवाही देने से मुकरने का इरादा है!)
आग दोज़ख की भी हो जायेगी पानी-पानी
जब ये आसी अर्क़-ए-शर्म से तर जायेंगे
शोला-ए-आह को बिजली की तरह चमकाऊँ
पर मुझे डर है के वो देखकर डर जायेंगे
लायें जो मस्त हैं तुरबत पे गुलाबी आँखें
और अगर कुछ नहीं, दो फूल तो धर जायेंगे
(उनका हमारी क़ब्र पे आना ही बहुत है. उनकी दो गुलाबी (आँसू भरी) आँखों से दो आँसू जो टपकेंगे, वो दो फूल के बराबर होंगे!)
नहीं पायेगा निशाँ कोई हमारा हरगिज़
हम जहाँ से रविश-ए-तीर-ए-नज़र जायेंगे
पहुँचेगे राहगुज़र-ए-यार तलक हम क्यूँकर
पहले जब तक न दो आलम से गुज़र जायेंगे
'ज़ौक़' जो मदरसे के बिगडे हुए हैं मुल्लाह
उनको मैखाने में ले आओ सँवर जायेंगे
(इब्राहीम ज़ौक़)
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