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मस्ताना पिये जा

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मयनोशी पर ग़ुलाम अली की आवाज़ में एक और मोती:

मस्ताना पिये जा, यूँही मस्ताना पिये जा
पैमाना तो क्या चीज़ है, मैखाना पिये जा

कर ग़र्क़ मय-ओ-जाम ग़म-ए-गर्दिश-ए-अय्याम
अब ऐ दिल-ए-नाकाम तू, मैखाना पिये जा

मयनोशी के आदाब से आगाह नहीं तू
जिस तरह कहे साक़ी-ए-मैखाना पिये जा

इस बस्ती में है वहशत-ए-मस्ती ही से हस्ती
दीवाना बन और बादा-ए-दीवाना पिये जा

मैखाने के हँगामें हैं कुछ देर के मेहमाँ
है सुबह क़रीब 'अख्तर' दीवाना पिये जा

(अखतर शिरानी)

हँगामा है क्यूँ बरपा

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ग़ुलाम अली की लरज़ती हुई आवाज़ हो, तो ग़ज़ल ग़ज़ल होती है:

हँगामा है क्यूँ बरपा, थोडी सी जो पी ली है
डाका तो नहीं डाला, चोरी तो नहीं की है

नातजुर्बाकारी से वाइज़ की ये बातें हैं
इस रँग को क्या जानें, पूछो तो कभी पी है

उस मय से नहीं मतलब, दिल जिस से हो बेगाना
मक़सूद है उस मय से, दिल ही में जो खिँचती है

वाँ दिल में कि सदमें दो, याँ जी में कि सब सह लो
उनका भी अजब दिल है, मेरा भी अजब जी है

हर ज़र्रा चमकता है, अन्वार-ए-इलाही से
हर साँस ये कहती है, हम हैं तो खुदा भी है

सूरज में लगे धब्बा, फ़ितरत के करिश्में हैं
बुत हमको कहें 'क़ाफ़िर' अल्लाह की मरज़ी है

(अक़बर इलाहाबादी)