Monday, January 26, 2009

आओ बच्चो तुम्हें दिखाएं

आओ बच्चो तुम्हें दिखाएं झाँकी हिंदुस्तान की
इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की
वंदे मातरम ...

उत्तर में रखवाली करता पर्वतराज विराट है
दक्षिण में चरणों को धोता सागर का सम्राट है
जमुना जी के तट को देखो गंगा का ये घाट है
बाट-बाट पे हाट-हाट में यहाँ निराला ठाठ है
देखो ये तस्वीरें अपने गौरव की अभिमान की,
इस मिट्टी से ...

ये है अपना राजपूताना नाज़ इसे तलवारों पे
इसने सारा जीवन काटा बरछी तीर कटारों पे
ये प्रताप का वतन पला है आज़ादी के नारों पे
कूद पड़ी थी यहाँ हज़ारों पद्‍मिनियाँ अंगारों पे
बोल रही है कण कण से कुरबानी राजस्थान की
इस मिट्टी से ...

देखो मुल्क मराठों का ये यहाँ शिवाजी डोला था
मुग़लों की ताकत को जिसने तलवारों पे तोला था
हर पावत पे आग लगी थी हर पत्थर एक शोला था
बोली हर-हर महादेव की बच्चा-बच्चा बोला था
यहाँ शिवाजी ने रखी थी लाज हमारी शान की
इस मिट्टी से ...

जलियाँ वाला बाग ये देखो यहाँ चली थी गोलियाँ
ये मत पूछो किसने खेली यहाँ खून की होलियाँ
एक तरफ़ बंदूकें दन दन एक तरफ़ थी टोलियाँ
मरनेवाले बोल रहे थे इनक़लाब की बोलियाँ
यहाँ लगा दी बहनों ने भी बाजी अपनी जान की
इस मिट्टी से ...

ये देखो बंगाल यहाँ का हर चप्पा हरियाला है
यहाँ का बच्चा-बच्चा अपने देश पे मरनेवाला है
ढाला है इसको बिजली ने भूचालों ने पाला है
मुट्ठी में तूफ़ान बंधा है और प्राण में ज्वाला है
जन्मभूमि है यही हमारे वीर सुभाष महान की
इस मिट्टी से ...

(प्रदीप)

Monday, March 17, 2008

तारे ज़मीं पर

ये प्यारा-सा मोती किसने नहीं सुना होगा?

देखो इन्हें, ये हैं आस की बूँदें
पत्तों की गोद में, आस्माँ से कूदें
अँगडाई लें, फिर करवट बदल कर
नाज़ुक-से मोती, हँस दें फिसलकर

खो न जायें ये...तारे ज़मीं पर

ये तो हैं सर्दी में, धूप की किरणे
उतरें तो आँगन को सुनहरा-सा कर दें
मन के अँधेरों को रौशन-सा कर दें
ठिठुरती हथेली की रँगत बदल दें

खो न जायें ये...तारे ज़मीं पर

जैसे आँखों की डिबिया में निँदिया
और निँदिया में मीठा-सा सपना
और सपने में मिल जाए फ़रिश्ता-सा कोई
जैसे रँगों भरी पिचकारी
जैसे तितलियाँ, फूलों की क्यारी
जैसे बिना मतलब का, प्यारा रिश्ता हो कोई

ये तो आशा की लहर हैं
ये तो उम्मीद की सहर है
खुशियों की नहर है

खो न जायें ये...तारे ज़मीं पर

देखो रातों के सीने पे ये तो
झिलमिल किसी लौ-से उगे हैं
ये तो अँबिया की खुश्बू है - बाग़ों से बह चले
जैसे काँच में चूडी के टुकडे
जैसे खिले-खिले फूलों के मुखडे
जैसे बँसी कोई बजाए पेडों के तले

ये तो झोंके हैं पवन के
हैं ये घुँघरू जीवन के
ये तो सुर है चमन के

खो न जायें ये...तारे ज़मीं पर

मुहल्ले की रौनक़ गलियाँ हैं जैसे
खिलने की ज़िद पर कलियाँ हों जैसे
मुठ्ठी में मौसम की जैसे हवाएँ
ये हैं बुज़ुर्ग़ों के दिल की दुआएँ

खो न जायें ये...तारे ज़मीं पर

कभी बातें जैसे दादी नानी
कभी छलकें जैसे "मम्-मम्" पानी
कभी बन जाएँ भोले, सवालों की झडी
सन्नाटे में हँसी के जैसे
सूने होंठों पे खुशी के जैसे
ये तो नूर हैं बरसे गर, तेरी क़िसमत हो बडी

जैसे झील मे लहराए चँदा
जैसे भीड में अपने का कँधा
जैसे मनमौजी नदिया, झाग उडाए कुछ कहे
जैसे बैठे-बैठे मीठी-सी झपकी
जैसे प्यार की धीमी-सी थपकी
जैसे कानों में सरगम हरदम बजती ही रहे

खो न जायें ये...तारे ज़मीं पर

(प्रसून जोशी)

Saturday, July 28, 2007

दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे

बेग़म अख्तर का गाया हुआ एक और सच्चा मोती:

दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे
वरना कहीं तक़दीर तमाशा न बना दे

ऐ देखनेवालों मुझे हँस-हँसके न देखो
तुमको भी मुहब्बत कहीँ मुझ-सा न बना दे

मैं ढूँढ रहा हूँ मेरी वो शम्मा कहाँ है
जो बज़्म की हर चीज़ को परवाना बना दे

आखिर कोई सूरत भी तो हो खाना-ए-दिल की
क़ाबा नहीं बनता है तो बुतखाना बना दे

'बेहज़ाद हरेक जाम पे इक सजदा-ए-मस्ती
हर ज़र्रे को सँग-ए-दर-ए-जानाँ न बना दे

(बेहज़ाद लखनवी)

Thursday, July 05, 2007

दोस्त बनकर भी नहीं साथ निभाने वाला

ग़ुलाम अली के शास्त्रीय-संगीत का नमूना इस खूबसूरत ग़ज़ल में दिखता है:

दोस्त बनकर भी नहीं साथ निभाने वाला
वही अन्दाज़ है ज़ालिम का ज़माने वाला

अब इसे लोग समझते हैं गिरफ़्तार मेरा
सख्त नदीम है मुझे दाम में लाने वाला

क्या कहें कितने मरासिम थे हमारे इससे
वो जो इक शक़्स है मुँह फेर के जाने वाला

तेरे होते हुए आ जाती थी सारी दुनिया
आज तन्हा हूँ तो कोई नहीं आने वाला

मुन्तज़िर किसका हूँ टूटी हुई दहलीज़ पे मैं
कौन आयेगा यहाँ कौन है आने वाला

मैने देखा है बहारों में चमन को जलते
है कोई ख्वाब की ताबीर बताने वाला

क्या खबर थी जो मेरी जाँ में घुला है इतना
है वही मुझको सर-ए-दार भी लाने वाला

तुम तक़्क़ल्लुफ़ को भी इखलास समझते हो 'फ़राज़'
दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला

(अहमद फ़राज़)

Sunday, June 10, 2007

सरफ़रोशी की तमन्ना

बिसमिल अज़ीमाबादी की ये पन्क्तियाँ राम प्रसाद 'बिसमिल' ने क्रान्तिकारी आँदोलन में देशभर में मशहूर कर दीं थीं:

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कातिल में है

करता नहीं क्यूँ दूसरा कुछ बातचीत,
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफ़िल में है
ए शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार,
अब तेरी हिम्मत का चरचा गैर की महफ़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

वक्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमान,
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है
खैंच कर लायी है सब को कत्ल होने की उम्मीद,
आशिकों का आज जमघट कूच-ए-कातिल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

है लिये हथियार दुशमन ताक में बैठा उधर,
और हम तैय्यार हैं सीना लिये अपना इधर.
खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हाथ जिन में हो जुनून कटते नही तलवार से,
सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से.
और भड़केगा जो शोला-सा हमारे दिल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हम तो घर से निकले ही थे बाँधकर सर पे कफ़न,
जान हथेली पर लिये लो बढ चले हैं ये कदम.
जिन्दगी तो अपनी मेहमान मौत की महफ़िल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

यूँ खड़ा मौकतल में कातिल कह रहा है बार-बार,
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसि के दिल में है.
दिल में तूफ़ानों कि टोली और नसों में इन्कलाब,
होश दुश्मन के उड़ा देंगे हमें रोको ना आज.
दूर रह पाये जो हमसे दम कहाँ मंज़िल में है,

वो जिस्म भी क्या जिस्म है जिसमें ना हो खून-ए-जुनून
तूफ़ानों से क्या लड़े जो कश्ती-ए-साहिल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कातिल में है

(बिसमिल अज़ीमाबादी)

Friday, June 01, 2007

अब छलकते हुए साग़र नहीं देखे जाते

बेग़म अख्तर ने इस पेहेले-ही से खूबसूरत ग़ज़ल को बखूबी निखारा है:

अब छलकते हुए साग़र नहीं देखे जाते
तौबा के बाद ये मन्ज़र नहीं देखे जाते

मस्त कर के मुझे औरों को लगा मुँह साक़ी
ये करम होश में रहकर नहीं देखे जाते

साथ हर एक को इस राह में चलना होगा
इश्क़ में रहज़न-ओ-रहबर नहीं देखे जाते

हमने देखा है ज़माने का बदलना लेकिन
उनके बदले हुए तेवर नहीं देखे जाते

(अली अहमद जलीली)

रफ़्ता-रफ़्ता वो मेरी

मेहंदी हसन की शहद-सी आवाज़ में ये ग़ज़ल और भी मीठी लगती है:

रफ़्ता-रफ़्ता वो मेरी हस्ती का सामाँ हो गए
पेहले जाँ, फिर जान-ए-जाँ फिर जान-ए-जाना हो गए

दिन-ब-दिन बढने लगीं हुस्न की रानाइयाँ
पेहले गुल, फिर गुल-बदन फिर गुल-बदामाँ गए

आप तो नज़दीक से नज़दीकतर आते गए
पेहले दिल, फिर दिलरुबा, फिर दिल के मेहमाँ हो गए

(तसलीम फ़ाज़ली)

Sunday, May 20, 2007

कल चौधवीं की रात थी

कल चौधवीं की रात थी, शब-भर रहा चर्चा तेरा
कुछ ने कहा ये चाँद है, कुछ ने कहा चेहरा तेरा

हम भी वहाँ मौजूद थे, हम से भी सब पूछा किये
हम हँस दिये, हम चुप रहे, मन्ज़ूर था पर्दा तेरा

इस शहर में किससे मिलें, हमसे तो छूटीं मेहफ़िलें
हर शक़्स तेरा नाम ले, हर शक़्स दीवाना तेरा

कूचे को तेरे छोड कर जोगी ही बन जायें मगर
जँगल तेरे, परबत तेरे, बस्ती तेरी सहरा तेरा
(सभी कुछ तो तेरा है!)

हम और रस्म-ए-बन्दग़ी, आशुफ़्तगी उफ़्तादगी
एहसान है क्या-क्या तेरा, ऐ हुस्न-ए-बेपरवा तेरा

दो अश्क़ जाने किस लिये, पलकों पे आकर टिक गये
अल्ताफ़ की बारिश तेरी, इकराम का दरया तेरा

ऐ बेदारेग़-ओ-बेअमाँ, हमने कभी की है फ़ुग़ाँ
हमको तेरी वहशत सही, हमको सही सौदा तेरा

तू बेवफ़ा तू मेहरबाँ, हम और तुझसे बदगुमाँ,
हमने तो पूछा था ज़रा, ये वक़्त क्यूँ ठहरा तेरा

हमपर ये सख्ती की नज़र, हम हैं फ़क़ीर-ए-रहगुज़र
रस्ता कभी रोका तेरा, दामन कभी थामा तेरा

हाँ-हा तेरी सूरत हसीं, लेकिन तू ऐसा भी नहीं
इस शक़्स के अश'आर से, शोहरा हुआ क्या-क्या तेरा

बेशक़ उसी का दोश है, कहता नहीं, खामोश है
तू आप कर ऐसी दवा, बीमार हो अच्छा तेरा

बेदर्द सुननी हो तो चल, कहता है क्या अच्छी ग़ज़ल
आशिक़ तेरा रुसवा तेरा, शायर तेरा 'इन्शा' तेरा

(इब्न-ए-इन्शा)

Thursday, May 10, 2007

किसी को दे के दिल कोई

चचा कितने गहरे हैं, उनके शेरों से पूछो:

किसी को दे के दिल कोई नवा-सन्ज-ए फ़ुग़ां क्यूं हो
न हो जब दिल ही सीने में तो फिर मुंह में ज़बां क्यूं हो
(जब किसी को दिल ही दे दिया, तो उसका रोना कैसा? आखिर सीने में दिल नहीं, तो मुँह में ज़बान भी क्यूँ हो?)

वह अपनी ख़ू न छोड़ेंगे हम अपनी वज़ा क्यूं छोड़ें
सुबुक-सर बन के क्या पूछें कि हम से सर-गिरां क्यूं हो
(आशिक़ और महबूब दोनों अपनी आन के पक्के हैं. कोई भी दूसरे से यह भी नहीं पूछ रहा के वो इतना मग़रूर क्यूँ है. आखिर दोनो ही मग़रूर हैं न!)

किया ग़म-ख़्वारी ने रुसवा लगे आग इस मुहब्बत को
न लावे ताब जो ग़म की वह मेरा राज़-दां क्यूं हो
(आशिक़ के राज़दानों कि हमदर्दी और कमज़ोर-दिली कि वजह से वह बदनाम हुआ जा रहा है. आखिर ऐसे राज़दानों का क्या फ़ायदा?)

वफ़ा कैसी कहां का इश्‌क़ जब सर फोड़ना ठहरा
तो फिर ऐ सँग-दिल तेरा ही सँग-ए आस्तां क्यूं हो
(ज़ालिम महबूब हमेशा यही कहता है के 'मेरे ज़ुलमों की शिकायत न किया करो, तुम तो वफ़ादार हो'. पर इसमे 'वफ़ा' का क्या काम, के अगर मेरी क़िसमत में सर ही फोडना है, तो उसी महबूब के चौखट के पत्थर पे ही क्यूँ?)

क़फ़स में मुझ से रूदाद-ए चमन कहते न डर हमदम
गिरी है जिस पह कल बिजली वो मेरा आशियां क्यूं हो
(बेहतरीन शेर! अभी-अभी एक नये ग़म की चपेट में आया इन्सान (पँछी) जो पहले ही ग़म में डूबा हुआ हो, अपने नये ग़म की अपेक्षा (ignore) करता है. पिँजरे में क़ैद पँछी, अपने बाहर बैठे दोस्त से कहता है "ऐ दोस्त, तू मुझे कल का चमन का पूरा हाल सुना, मत डर. कल जिस आशियाने पे बिजली गिरी है, वो तो मेरा हो ही नहीं सकता. मै पहले ही इतने दु:ख में हूँ, भला मुझ पे और ग़म क्यूँ आ-गिरने लगा?". बहुत खूब!!)

ये कह सकते हो हम दिल में नहीं हैं पर यह बतलाओ
कि जब दिल में तुम्हीं तुम हो तो आंखों से निहां क्यूं हो
(महबूब आशिक़ से कहता है 'क्यूँ गिला करते हो? क्या हम तुम्हारे दिल में नहीं रहते?खो'. पर आशिक़ कहता है 'अगर दिल में रहते हो, तो आँखों में क्यूँ नहीं दिखते?'...मिलने क्यूँ नहीं आते?)

ग़लत है जज़्ब-ए दिल का शिकवा देखो जुर्म किस का है
न खेंचो गर तुम अपने को कशाकश दर‌मियां क्यूं हो
(ऐ महबूब तू दिल के खिँचने का शिक़वा कैसे कर सकता है? तू अगर अपने दिल को खींचकर न रखे, मेरी ओर आने दे, तो ये कश-म-कश भला हो ही क्यूँ? भई वाह!)

ये फ़ितना आदमी की ख़ाना-वीरानी को क्या कम है
हुए तुम दोस्त जिस के दुश्मन उसका आस्मां क्यूं हो
(तेरी दोस्ती से तो अच्छे-अच्छों के घर वीरान हो जायें)

यही है आज़माना तो सताना किस को कह्‌ते हैं
अदू के हो लिये जब तुम तो मेरा इम्तिहां क्यूं हो
(महबूब कभी कभी कहता है 'मैं तो तुम्हे आज़मा रहा था'. अगर वो रक़ीब का हो ही लिया, तो भला मेरा 'इम्तिहान' लेने का क्या मतलब?)

कहा तुम ने कि क्यूं हो ग़ैर के मिलने में रुस्वाई
बजा कहते हो सच कहते हो फिर कहयो कि हां क्यूं हो
(महबूब रक़ीब से मिलता है. और कहता है 'भला इसमें रूसवाई क्यूँ हो?' इसपे आशिक़ कहता है 'तुम कितना सच कहती हो. तुम्ही मुझे बताओ, के रूसवाई क्यूँ हो?')

निकाला चाह्‌ता है काम क्या तानों से तू 'ग़ालिब'
तेरे बे-मिहर कहने से वो तुझ पर मिहरबां क्यूं हो
(जैसा के चचा ने पूरि ग़ज़ल मे किया), आशिक़ महबूब को ताने मार्-मार के काम निकलवान चाहता है. पर ये तरीक़ा काम नहीं करता. भला महबूब को 'बेमिह्‌र' कहने से वो मेहरबान हो जायेगा?

(मिर्ज़ा ग़ालिब)

Tuesday, April 03, 2007

अब तो घबरा के ये कहते हैं के मर जायेंगे

ज़ौक़ को मैने पहले कभी पढा नहीं था, पर ये मोती जब मिला तो नायाब-सा लगा:

अब तो घबरा के ये कहते हैं के मर जायेंगे
मरके भी चैन न पया, तो किधर जायेंगे

तुम ने ठहराई अगर ग़ैर के घर जाने की
तो इरादे यहाँ कुछ और ठहर जायेंगे

हम नहीं वो जो करें खून का दावा तुझपर
बलकि पूछेगा खुदा भी, तो मुक़र जायेंगे
(आशिक़ की वफादारी पे ग़ौर करें: महबूब के हाथों क्त्ल होने के बाद भी कोई गिला नहीं. उलटा खुदा को भी अपने क्त्ल की गवाही देने से मुकरने का इरादा है!)

आग दोज़ख की भी हो जायेगी पानी-पानी
जब ये आसी अर्क़-ए-शर्म से तर जायेंगे

शोला-ए-आह को बिजली की तरह चमकाऊँ
पर मुझे डर है के वो देखकर डर जायेंगे

लायें जो मस्त हैं तुरबत पे गुलाबी आँखें
और अगर कुछ नहीं, दो फूल तो धर जायेंगे
(उनका हमारी क़ब्र पे आना ही बहुत है. उनकी दो गुलाबी (आँसू भरी) आँखों से दो आँसू जो टपकेंगे, वो दो फूल के बराबर होंगे!)

नहीं पायेगा निशाँ कोई हमारा हरगिज़
हम जहाँ से रविश-ए-तीर-ए-नज़र जायेंगे

पहुँचेगे राहगुज़र-ए-यार तलक हम क्यूँकर
पहले जब तक न दो आलम से गुज़र जायेंगे

'ज़ौक़' जो मदरसे के बिगडे हुए हैं मुल्लाह
उनको मैखाने में ले आओ सँवर जायेंगे

(इब्राहीम ज़ौक़)

Wednesday, March 21, 2007

नज़्म उलझी हुई है सीने में

गुलज़ार नज़्म लिखते हुए क़लम ही तोड देते हैं:

नज़्म उलझी हुई है सीने में
मिसरे अटके हुए हैं होंठों पर
उडते फिरते हैं तितलियों की तरह
लफ़्ज़ काग़ज़ पे बैठते ही नहीं
कब से बैठा हूँ मैं जानम
सादे काग़ज़ पे लिखके नाम तेरा

बस तेरा नाम ही मुक़म्मल है
इससे बेहतर भी नज़्म क्या होगी

(गुलज़ार)

Friday, March 16, 2007

दिल में इक लहर-सी उठी है अभी

ग़ुलाम भाई की आवाज़, और ऐसी बेहतरीन शायरी के हम क्यूँ न ग़ुलाम हों?

दिल में इक लहर-सी उठी है अभी
कोई ताज़ा हवा चली है अभी

शोर बरपा है खाना-ए-दिल में
कोई दीवार-सी गिरी है अभी

कुछ तो नाज़ुक़ मिजाज़ हैं हम भी
और ये चोट भी नई है अभी

भरी दुनिया में जी नहीं लगता
जाने किस चीज़ की कमी है अभी

तू शरीक़-ए-सुखन नहीं है तो क्या
हम-सुखन तेरी खामोशी है अभी

याद के बे-निशाँ जज़ीरों से
तेरी आवाज़ आ रही है अभी

शहर की बे-चराग़ गलियों में
ज़िन्दग़ी तुझको ढूँढती है अभी

सो गए लोग उस हवेली के
एक खिडकी मगर खुली है अभी

वक़्त अच्छा भी आएगा 'नसिर'
ग़म न कर ज़िन्दग़ी पडी है अभी

(नसिर क़ाज़मी)

Monday, March 05, 2007

दिखाई दिये यूँ, के बेखुद किया

कुछ ग़ज़लें फ़िल्मी गीत होने की वजह से ग़ज़लें नहीं लगतीं. ये ग़ज़ल उन्ही में से है. मीर की ग़ज़ल होने की वजह से गहरी भी है, और रस भरी भी:

दिखाई दिये यूँ, के बेखुद किया
हमें आपसे भी जुदा कर चले
(आप हमें यूँ दिखाई दिये, के बेखुद कर दिया. इतना, के हम आपसे मिलना भी भूल गए, और आपसे जुदा होते चले गए)

जबीं सजदा करते ही करते गई
हक़-ए-बन्दग़ी हम अदा कर चले

परस्तिश किया तक, के ऐ बुत तुझे
नज़र में सभों की खुदा कर चले

बहुत आरज़ू थी, गली की तेरी
सो याँ से लहू में नहा कर चले

फ़क़ीराना आये सदा कर चले
मिया खुश रहो हम दुआ कर चले

जो तुझ बिन न जीने का कहते थे हम
सो उस अहद को अब वफ़ा कर चले
(देख आज हम मर रहे हैं. तेरे बिन न जीने की जो क़समें खाईं थी, वो आज निबाह ही दीं)

कोई नाउम्मीद न करदे निगाह
सो तुम हमसे मुँह भी छुपा कर चले

(मीर तक़ी 'मीर')

Sunday, February 25, 2007

अफ़साना लिख रही हूँ

शक़ील के सादा लफ़्ज़ों का कमाल:

अफ़साना लिख रही हूँ दिल-ए-बेक़रार का
आँखों में रँग भरके तेरे इन्तज़ार का

जब तू नहीं तो कुछ भी नहीं है बहार में
जी चाहता है मुँह भी न देखूँ बहार का

हासिल हैं यूँ तो मुझको ज़माने की दौलतें
लेकिन नसीब लाई हूँ इक सोगवार का

आजा के अब तो आँखों में आँसू भी आ गए
साग़र छलक उठा मेरे सब्र-ओ-क़रार का

(शक़ील बदायूनी)

Thursday, February 08, 2007

मिलती है खू-ए-यार से नार इल्तिहाब में

चचा का एक और कमाल!

मिलती है खू-ए-यार से नार इल्तिहाब में
क़ाफ़िर हूँ गर न मिलती हो राहत अज़ाब में
(जहन्नुम की आग बिलकुल मेरे महबूब के ग़ुस्से की तरह है. तो क्यूँ न मुझे जहन्नुम मे भी राहत मिले? दरअस्ल, जहन्नुम में राहत न मिले, तो मैं क़ाफ़िर! एक मुसल्मान के लिये क़फ़िर की जगह जहन्नुम में ही होती है, पर चचा ऐसे जहन्नुम की आग में भी राहत पाते हैं, जो महबूब के मिजाज़ की तरह गर्म है!)

कब से हूँ क्या बताऊँ जहान-ए-खराब में
शबहा-ए-हिज्र को भी रखूँ गर हिसाब में
(मेरी उम्र क्या होगी? अपने बद्क़िसमत दिनों क क्या हिसाब दूँ? जुदाई की रातें भी गिनूँ क्या?)

ता फिर न इन्तज़ार में नींद आए उम्र भर
आने का अहद कर गए आए जो ख्वाब में
(वो ख्वाब में आये, और आने का वादा कर गये. जब आँख खुली, तो वो न थे, पर अब इन्तज़ार में नींद भी नहीं आ रही - कहीं वो फिर ख्वाब में ही तो नहीं आने वाले थे? भई वाह!)

क़ासिद के आते-आते खत इक और लिख रखूँ
मैं जानता हूँ, जो वो लिखेंगे जवाब में
(बेहतरीन शेर! महबूब की फ़ितरत से मैं इतनी अच्छी तरह वाक़िफ़ हूँ, के हर बात पे उनका क्या जवाब होगा, मैं जानता हूँ. तो क़ासिद के आने का इन्तज़ार न करके उनके खत का जवाब ही लिख डालूँ)

मुझ तक कब उनकी बज़्म में आता था दौर-ए-जाम
साक़ी ने कुझ मिला न दिया हो शराब में
(एक और बेहतरीन शेर!! उनकी महफ़िल में ऐसा पेहले तो कभी न हुआ था के मुझे जाम नसीब होता. आज ये जाम मुझ तक कैसे आ गया? डरता हूँ के कहीं साक़ी ने इसमें कुछ मिला तो नहीं दिया?)

जो मुनकिर-ए-वफ़ा हो फ़रेब उसपे क्या चले
क्यूँ बदगुमाँ हूँ दोस्त से दुशमन के बाब में
(मेरा महबूब तो वफ़ा में यक़ीन ही नहीं करता. तो रक़ीब जितना भी चाहे, उसपे वफ़ा क फ़रेब नहीं कर सकता. तो मैं महबूब पे शक़ ही क्यूँ करूँ?)

मैं मुज़तरिब हूँ वस्ल में खौफ़-ए-रक़ीब से
डाला है तुमको वहम ने किस पेच-ओ-ताब में
(मैं भला मिलन के वक़्त क्यूँ रक़ीब का डर करूँ? किस वहम में पडी हो तुम?)

मैं और हिज़्ज़-ए-वस्ल खुदा-साज़ बात है
जाँ नज़र देनी भूल गया इज़्तिराब में
(मैं और वस्ल की खुशी! ये तो खुदा की ही क़रामात है! अरे! मैं इस खुशी में अपनी जाँ फ़िदा करना ही भूल गया)

है तेवरी चढी हुई अन्दर नक़ाब के
है इक शिकन पडी हुई तर्फ-ए-नक़ाब में
(तुम्हारे चेहरे पे ज़रूर तेवर चढे हुए है. इतने गहरे, के नक़ाब के ऊपर भी सिलवट पड गई!)

लाखों लगाव, इक चुराना निगाह का
लाखों बनाव, इक बिगडना इताब में
(तेरे लाखों लगाव, और एक नज़र चुराने की अदा, दोनो बराबर हैं! लाखों बनाव की अदाएँ, तेरे एक ग़ुस्से के बराबर हैं!)

वो नाला दिल में खस बराबर जगह न पाए
जिस नाले से शिगाफ़ पडे आफ़ताब में
(मेरे शिक़वे को उनके दिल में तिनके बराबर जगह नहीं मिलती! ऐसा शिक़वा जिससे सूरज में घाव हो जाए! वाह!)

वो सिह्‌र मुद्द-आ तलबी में न काम आए
जिस सिह्‌र से सफ़ीना रवाँ हो सराब में
(ऐसा जादू, जो सराब (मृगतृष्णा) जहाज़ बहा दे, ऐसा जादू यहाँ (मेहबूब के मामले में) बिलकुल काम नहीं आ रहा!)

'ग़ालिब' छुटी शराब पर अब भी कभी-कभी
पीता हूँ रोज़-ए-अब्र-ओ-शब-ए-माहताब में
(चचा पीना नहीं छोड सकते!!)


(मिर्ज़ा ग़ालिब)

Tuesday, December 05, 2006

आप जिनके क़रीब होते हैं

आप जिनके क़रीब होते हैं
वो बडे खुशनसीब होते हैं

जब तबीयत किसी पे आती है
मौत के दिन क़रीब होते हैं
(शायर अपनी बदक़िसमती पे अफ़सोस कर रहा है, के जब जब दिल किसी पे आया, ऐसे वक़्त पे आया के मौत भी क़रीब थी. याने इश्क़ का लुत्फ़ भी पूरा न मिल सका. ग़ौर करने की बात एक और ये है, के 'मौत के दिन क़रीब होते हैं' से मौत के बार-बार आने का इल्म होता है. जो के मुमकिन नहीं. मौत के बार-बार आने से यहाँ मानी हिज्र [जुदाई] से भी हो सकता है)

मुझसे मिलना फिर आपका मिलना
आप किसको नसीब होते हैं
(यूँ तो शायर मान ही नहीं पा रहा है के उससे किसी को इश्क़ हो गया है. और वो भी 'आप' का शायर से इश्क़ हो जाना बिलकुल भी मुमकिन न था, क्यूँके 'आप' तो किसी को नसीब नहीं होते !)

ज़ुल्म सह कर जो उफ़्फ़ नहीं करते
उनके दिल भी अजीब होते हैं

(नूह नारवी)

Friday, December 01, 2006

कहते हैं मुझसे इश्क़ का अफ़साना चाहिए

कहते हैं मुझसे इश्क़ का अफ़साना चाहिए
रुसवाई हो गई तुम्हे शरमाना चाहिए

खुद्दार इतनी फ़ितरत-ए-रिन्दाँ न चाहिए
साक़ी ये खुद कहे तुझे पैमाना चाहिए

आशिक़ बग़ैर हुस्न-ओ-जवानी फ़िज़ूल है
जब शम्मा जल रही है तो, परवाना चाहिए

आँखों में दम रुका है किसी के लिए ज़ुरूर
वरना मरीज़-ए-हिज्र को मर जाना चाहिए

वादा था उनके रात के आने का ऐ 'क़मर'
अब चाँद छुप गया उन्हें आ जाना चाहिए

(क़मर जलालवी)

Monday, November 20, 2006

साँस लेना भी कैसी आदत है

गुलज़ार साहब की आज़ाद शायरी क जवाब है क्या?

साँस लेना भी कैसी आदत है
जिये जाना भी क्या रवायत है
कोई आहट नहीं बदन में कहीं
कोई साया नहीं है आँखों में
पाँव बेहिस हैं, चलते जाते हैं
इक सफ़र है, जो बहता रहता है
कितने बरसों से, कितनी सदियों से
जिए जाते हैं, जिए जाते हैं

आदतें भी अजीब होतीं हैं

('गुलज़ार')

Monday, October 30, 2006

कभी कहा न किसी से

कभी कहा न किसी से तेरे फ़साने को
न जाने कैसे खबर हो गई ज़माने को

चमन में बर्क़ नहीं छोडती किसी सूरत
तरह-तरह से बनाता हूँ आशियाने को

सुना है ग़ैर की महफ़िल में तुम न जाओगे
कहो तो आज सजा लूँ ग़रीबखाने को

दुआ बहार की माँगी तो इतने फूल खिले
कहीं जगह न मिली मेरे आशियाने को

चमन में जाना तो सय्याद देखकर जाना
अकेला छोडकर आया हूँ आशियाने को

मेरी लहद पे पतँगों का खून होता है
हु़ज़ूर शम्मा ने लाया करें जलाने को

दबा के चल दिये सब क़ब्र में दुआ न सलाम
ज़रा-सी देर में क्या हो गया ज़माने को

अब आगे इसमें तुम्हारा भी नाम आयेगा
जो हुक़्म हो तो यहीं छोड दूँ फ़साने को

'क़मर' ज़रा भी नहीं तुझको खौफ़-ए-रुसवाई
चले हो चाँदनी शब में उन्हे मनाने को

(क़मर जलालाबादी)

तुम्हारी अँजुमन से उठके

फ़रीदा खानम की मदभरी आवाज़ में पिरोए चन्द सच्चे मोती:

तुम्हारी अँजुमन से उठके दीवाने कहाँ जाते
जो वाबस्ता हुए तुमसे वो अफ़्साने कहाँ जाते

निकलकर दैर-ओ-क़ाबा से अगर मिलता न मैखाना
तो ठुकराए हुए इन्साँ, खुदा जाने कहाँ जाते

तुम्हारी बेरुखी ने लाज रख ली बादाखाने की
तुम आँखों से पिला देते तो पैमाने कहाँ जाते

चलो अच्छा हुआ काम आ गई दीवानग़ी अपनी
वगरना हम ज़माने भर को समझाने कहाँ जाते

'क़तील' अपना मुक़द्दर ग़म से बेग़ाना अगर होता
फिर तो अपने पराए हमसे पेहचाने कहाँ जाते

(क़तील शिफ़ाई)