पुत्त जट्टां दे

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पंजाबी बोलियां...दिल को छू लेने वालीः

पुत्त जट्टां दे बलौन्दे बकरे, पुत्त जट्टां दे
जट्टां दे बलौन्दे बकरे, मोड्डेयां ते डांगां धरियां, भई कैंठे सोने दे
सोने दे गर्जणा, लमियां मटक नाल पब चकदे, भई चिट्टे चादरे
चादरे सुमरदे धरती, भई चिट्टे चादरे
चादरे सुमरदे धरती, गब्बां विच बन्द बोतलां, पासे हट जा
हट जा, जट्टां नूं राह छड दे नी रेशमी गरारे वालिए, लेओन्दे कलियां
कलियां, कन्ना ते हथ धर के, लेओन्दे कलियां
कलियां, कन्ना ते हथ धर के, खडी होके तूं वि सुण लै, नारे..
नारे, जट्टां दे पुत्त पौण बोलियां, नी मुटियारे, मुटियारे, मुटियारे...

जट्ट पाणियां पंजां दे धारू, भई जट्ट पाणियां
पाणियां पंजां दे धारू, उच्चे लम्मे छैल गबरू, विच कन्नां दे
कन्ना दे झूलदियां नटियां, हथां च डांगां सम्मां वाळियां, जदों तुरदे
तुरदे कलैरी मोर लगदे, भई जदों तुरदे
तुरदे कलैरी मोर लगदे, सिरां ते चीरे सत रंग दे, जेडे जट ने
जट ने मँगाए कलकत्तेयों भई, जेडे जट ने
जट ने मँगाए कलकत्तेयों, जोबरां दी टौर वखरी, दाणे
दाणॅ, जट्टां दे पुत्त ठेके मिलदे जा ठाणे, जा ठाणे, जा ठाणे...

जट्ट यारियां निभौंदे सिर देके, भई, जट्ट यारियां
यारियां निभौंदे सिर देके बा धम चाल छड दे, पुत्त जट्ट दा
जट्ट दा हीर लइ रांझा जट्टिए निसाध हो गया, जट्ट मिर्जा
मिर्जा जिन्डोरे हेठां भई, जट्ट मिर्जा
मिर्जा जिन्डोरे हेठां वाद गया जिन्द साइबां तो, पट्ट चीर के
चीर के खवौन्दे जट्ट यार नूं, चनाथ कुली पौण जानदे, सौणा...
सौणा, लबदी मर जाएगी, न जट्ट ध्यौणा, जट्ट ध्यौणा, जट्ट ध्यौणा...

जट्ट उत्ते ते टरॅक्टर हेठां भई, जट्ट उत्ते ते
उत्ते ते टरॅक्टर हेठां, बौन्दा फिरे पन्जेयां नूं, जट्ट खेतां च
खेतां च अगौन्दे फसलां, खेड लौन्दे तांणेयां दा, तोड अन्न दा
अन्न दा नी कर दित्ता पूरा, तोड अन्न दा
अन्न दा नी कर दित्ता पूरा, धनवान देस हो गया, पाके डन्डियां
डन्डियां राणियां बणियां, जट्टियां पंजाब दीयां, नारिये
नारिये, जट्टां दे पुत्त पौण बोलियां, करतारिये, करतारिये, करतारिये...

जट्ट सूरमे देश लई बल्लिये, जट्ट सूरमे
सूरमे देश लई बल्लिये, हंसके ने फांसी चढ़दे, कोई गबरू
गबरू सरबा बणदा, बणे कोई भगत सिंह नी, उधम सिंह कोई
सिंह कोइ लन्डन विच जाके, गोरा मार लैन्दा बदला, बाबे गदरी
गदरी ते बबर अकाली, बाबे गदरी
गदरी ते बबर अकाली, जिंद ला गए लेखे देश दे, हसदे
हसदे, देव कैंदा सदा ही पंजाबी रैण वसदे, रैण वसदे, रैण वसदे...

पुत्त जट्टां दे बलौन्दे बकरे, पुत्त जट्टां दे..

आओ बच्चो तुम्हें दिखाएं

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आओ बच्चो तुम्हें दिखाएं झाँकी हिंदुस्तान की
इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की
वंदे मातरम ...

उत्तर में रखवाली करता पर्वतराज विराट है
दक्षिण में चरणों को धोता सागर का सम्राट है
जमुना जी के तट को देखो गंगा का ये घाट है
बाट-बाट पे हाट-हाट में यहाँ निराला ठाठ है
देखो ये तस्वीरें अपने गौरव की अभिमान की,
इस मिट्टी से ...

ये है अपना राजपूताना नाज़ इसे तलवारों पे
इसने सारा जीवन काटा बरछी तीर कटारों पे
ये प्रताप का वतन पला है आज़ादी के नारों पे
कूद पड़ी थी यहाँ हज़ारों पद्‍मिनियाँ अंगारों पे
बोल रही है कण कण से कुरबानी राजस्थान की
इस मिट्टी से ...

देखो मुल्क मराठों का ये यहाँ शिवाजी डोला था
मुग़लों की ताकत को जिसने तलवारों पे तोला था
हर पावत पे आग लगी थी हर पत्थर एक शोला था
बोली हर-हर महादेव की बच्चा-बच्चा बोला था
यहाँ शिवाजी ने रखी थी लाज हमारी शान की
इस मिट्टी से ...

जलियाँ वाला बाग ये देखो यहाँ चली थी गोलियाँ
ये मत पूछो किसने खेली यहाँ खून की होलियाँ
एक तरफ़ बंदूकें दन दन एक तरफ़ थी टोलियाँ
मरनेवाले बोल रहे थे इनक़लाब की बोलियाँ
यहाँ लगा दी बहनों ने भी बाजी अपनी जान की
इस मिट्टी से ...

ये देखो बंगाल यहाँ का हर चप्पा हरियाला है
यहाँ का बच्चा-बच्चा अपने देश पे मरनेवाला है
ढाला है इसको बिजली ने भूचालों ने पाला है
मुट्ठी में तूफ़ान बंधा है और प्राण में ज्वाला है
जन्मभूमि है यही हमारे वीर सुभाष महान की
इस मिट्टी से ...

(प्रदीप)

तारे ज़मीं पर

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ये प्यारा-सा मोती किसने नहीं सुना होगा?

देखो इन्हें, ये हैं आस की बूँदें
पत्तों की गोद में, आस्माँ से कूदें
अँगडाई लें, फिर करवट बदल कर
नाज़ुक-से मोती, हँस दें फिसलकर

खो न जायें ये...तारे ज़मीं पर

ये तो हैं सर्दी में, धूप की किरणे
उतरें तो आँगन को सुनहरा-सा कर दें
मन के अँधेरों को रौशन-सा कर दें
ठिठुरती हथेली की रँगत बदल दें

खो न जायें ये...तारे ज़मीं पर

जैसे आँखों की डिबिया में निँदिया
और निँदिया में मीठा-सा सपना
और सपने में मिल जाए फ़रिश्ता-सा कोई
जैसे रँगों भरी पिचकारी
जैसे तितलियाँ, फूलों की क्यारी
जैसे बिना मतलब का, प्यारा रिश्ता हो कोई

ये तो आशा की लहर हैं
ये तो उम्मीद की सहर है
खुशियों की नहर है

खो न जायें ये...तारे ज़मीं पर

देखो रातों के सीने पे ये तो
झिलमिल किसी लौ-से उगे हैं
ये तो अँबिया की खुश्बू है - बाग़ों से बह चले
जैसे काँच में चूडी के टुकडे
जैसे खिले-खिले फूलों के मुखडे
जैसे बँसी कोई बजाए पेडों के तले

ये तो झोंके हैं पवन के
हैं ये घुँघरू जीवन के
ये तो सुर है चमन के

खो न जायें ये...तारे ज़मीं पर

मुहल्ले की रौनक़ गलियाँ हैं जैसे
खिलने की ज़िद पर कलियाँ हों जैसे
मुठ्ठी में मौसम की जैसे हवाएँ
ये हैं बुज़ुर्ग़ों के दिल की दुआएँ

खो न जायें ये...तारे ज़मीं पर

कभी बातें जैसे दादी नानी
कभी छलकें जैसे "मम्-मम्" पानी
कभी बन जाएँ भोले, सवालों की झडी
सन्नाटे में हँसी के जैसे
सूने होंठों पे खुशी के जैसे
ये तो नूर हैं बरसे गर, तेरी क़िसमत हो बडी

जैसे झील मे लहराए चँदा
जैसे भीड में अपने का कँधा
जैसे मनमौजी नदिया, झाग उडाए कुछ कहे
जैसे बैठे-बैठे मीठी-सी झपकी
जैसे प्यार की धीमी-सी थपकी
जैसे कानों में सरगम हरदम बजती ही रहे

खो न जायें ये...तारे ज़मीं पर

(प्रसून जोशी)

दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे

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बेग़म अख्तर का गाया हुआ एक और सच्चा मोती:

दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे
वरना कहीं तक़दीर तमाशा न बना दे

ऐ देखनेवालों मुझे हँस-हँसके न देखो
तुमको भी मुहब्बत कहीँ मुझ-सा न बना दे

मैं ढूँढ रहा हूँ मेरी वो शम्मा कहाँ है
जो बज़्म की हर चीज़ को परवाना बना दे

आखिर कोई सूरत भी तो हो खाना-ए-दिल की
क़ाबा नहीं बनता है तो बुतखाना बना दे

'बेहज़ाद हरेक जाम पे इक सजदा-ए-मस्ती
हर ज़र्रे को सँग-ए-दर-ए-जानाँ न बना दे

(बेहज़ाद लखनवी)

दोस्त बनकर भी नहीं साथ निभाने वाला

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ग़ुलाम अली के शास्त्रीय-संगीत का नमूना इस खूबसूरत ग़ज़ल में दिखता है:

दोस्त बनकर भी नहीं साथ निभाने वाला
वही अन्दाज़ है ज़ालिम का ज़माने वाला

अब इसे लोग समझते हैं गिरफ़्तार मेरा
सख्त नदीम है मुझे दाम में लाने वाला

क्या कहें कितने मरासिम थे हमारे इससे
वो जो इक शक़्स है मुँह फेर के जाने वाला

तेरे होते हुए आ जाती थी सारी दुनिया
आज तन्हा हूँ तो कोई नहीं आने वाला

मुन्तज़िर किसका हूँ टूटी हुई दहलीज़ पे मैं
कौन आयेगा यहाँ कौन है आने वाला

मैने देखा है बहारों में चमन को जलते
है कोई ख्वाब की ताबीर बताने वाला

क्या खबर थी जो मेरी जाँ में घुला है इतना
है वही मुझको सर-ए-दार भी लाने वाला

तुम तक़्क़ल्लुफ़ को भी इखलास समझते हो 'फ़राज़'
दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला

(अहमद फ़राज़)

सरफ़रोशी की तमन्ना

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बिसमिल अज़ीमाबादी की ये पन्क्तियाँ राम प्रसाद 'बिसमिल' ने क्रान्तिकारी आँदोलन में देशभर में मशहूर कर दीं थीं:

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कातिल में है

करता नहीं क्यूँ दूसरा कुछ बातचीत,
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफ़िल में है
ए शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार,
अब तेरी हिम्मत का चरचा गैर की महफ़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

वक्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमान,
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है
खैंच कर लायी है सब को कत्ल होने की उम्मीद,
आशिकों का आज जमघट कूच-ए-कातिल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

है लिये हथियार दुशमन ताक में बैठा उधर,
और हम तैय्यार हैं सीना लिये अपना इधर.
खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हाथ जिन में हो जुनून कटते नही तलवार से,
सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से.
और भड़केगा जो शोला-सा हमारे दिल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हम तो घर से निकले ही थे बाँधकर सर पे कफ़न,
जान हथेली पर लिये लो बढ चले हैं ये कदम.
जिन्दगी तो अपनी मेहमान मौत की महफ़िल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

यूँ खड़ा मौकतल में कातिल कह रहा है बार-बार,
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसि के दिल में है.
दिल में तूफ़ानों कि टोली और नसों में इन्कलाब,
होश दुश्मन के उड़ा देंगे हमें रोको ना आज.
दूर रह पाये जो हमसे दम कहाँ मंज़िल में है,

वो जिस्म भी क्या जिस्म है जिसमें ना हो खून-ए-जुनून
तूफ़ानों से क्या लड़े जो कश्ती-ए-साहिल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कातिल में है

(बिसमिल अज़ीमाबादी)

अब छलकते हुए साग़र नहीं देखे जाते

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बेग़म अख्तर ने इस पेहेले-ही से खूबसूरत ग़ज़ल को बखूबी निखारा है:

अब छलकते हुए साग़र नहीं देखे जाते
तौबा के बाद ये मन्ज़र नहीं देखे जाते

मस्त कर के मुझे औरों को लगा मुँह साक़ी
ये करम होश में रहकर नहीं देखे जाते

साथ हर एक को इस राह में चलना होगा
इश्क़ में रहज़न-ओ-रहबर नहीं देखे जाते

हमने देखा है ज़माने का बदलना लेकिन
उनके बदले हुए तेवर नहीं देखे जाते

(अली अहमद जलीली)

रफ़्ता-रफ़्ता वो मेरी

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मेहंदी हसन की शहद-सी आवाज़ में ये ग़ज़ल और भी मीठी लगती है:

रफ़्ता-रफ़्ता वो मेरी हस्ती का सामाँ हो गए
पेहले जाँ, फिर जान-ए-जाँ फिर जान-ए-जाना हो गए

दिन-ब-दिन बढने लगीं हुस्न की रानाइयाँ
पेहले गुल, फिर गुल-बदन फिर गुल-बदामाँ गए

आप तो नज़दीक से नज़दीकतर आते गए
पेहले दिल, फिर दिलरुबा, फिर दिल के मेहमाँ हो गए

(तसलीम फ़ाज़ली)