नुसरत फ़तेह अली की एक बेहतरीन क़व्वाली (ग़ज़ल)
बरसों के इंतज़ार का अंजाम लिख दिया
काग़ज़ पे श्याम काट के फिर श्याम लिख दिया
बिखरी पड़ी थी टूट के कलियाँ ज़मीन पर
तरतीब देके मै ने तेरा नाम लिख दिया
आसाँ नहीं थी तर्क-ए-मुहब्बत की दास्तां
जो आँसुओं ने आख़िरी पैग़ाम लिख दिया
हम को किसी के हुस्न ने शाइर बना दिया
होंठों का नाम ले न सके जाम लिख दिया
अल्लाह! ज़िंदगी से कहाँ तक निभाऊं मैं
किस बेवफा के साथ मेरा नाम लिख दिया
तक़सीम हो रहीं थी ख़ुदाई की नेमतें
इक इश्क़ बच गया सो मेरे नाम लिख दिया
'कैसर' किसी की दें है ये शायरी मेरी
उसकी ग़ज़ल पे किसने मेरा नाम लिख दिया
बरसों के इंतज़ार का अंजाम लिख दिया
काग़ज़ पे श्याम काट के फिर श्याम लिख दिया
बिखरी पड़ी थी टूट के कलियाँ ज़मीन पर
तरतीब देके मै ने तेरा नाम लिख दिया
आसाँ नहीं थी तर्क-ए-मुहब्बत की दास्तां
जो आँसुओं ने आख़िरी पैग़ाम लिख दिया
हम को किसी के हुस्न ने शाइर बना दिया
होंठों का नाम ले न सके जाम लिख दिया
अल्लाह! ज़िंदगी से कहाँ तक निभाऊं मैं
किस बेवफा के साथ मेरा नाम लिख दिया
तक़सीम हो रहीं थी ख़ुदाई की नेमतें
इक इश्क़ बच गया सो मेरे नाम लिख दिया
'कैसर' किसी की दें है ये शायरी मेरी
उसकी ग़ज़ल पे किसने मेरा नाम लिख दिया
